शनिवार, 11 जुलाई 2020

आओगी न कल्पना....?

आओगी न कल्पना....?

अक्सर ये सपना देखती हूँ....

एक बुढ़िया पहाड़ पर एक ऊंची जगह पर डायरी की पन्ने पलट रही है। बादलों के साथ कॉफी पी रही है। हैडफ़ोन पर बरसों पुरानी प्लेलिस्ट चल रही है। आते जाते लोगों को हाथ हिलाकर मुस्कुरा रही है। 
एक प्रेमी जोड़ा कुछ पूछने के लिए उसके पास रुकता है।फिर वहीं उसके पास बैठा ही रह जाता है। उनसे बातें करते करते वो डायरी के कुछ पन्ने फाड़ फाड़  कर उन्हें पकड़ा रही। जाते वक्त दोनों बुढ़िया का माथा चूम रहे। 
फिर अगले दिन नया जोड़ा 
फिर नया 
और फिर एक नया जोड़ा

बुढ़िया की डायरी के पन्ने खत्म होने को हैं ... 
हल्की से थोड़ी ज्यादा ठंड को अपने कोट में दबाये हुए बुढ़िया आज फिर किसी प्रेमी जोड़े के इंतज़ार में है...
Coffee भी आज इंतज़ार में रुक-रुक कर ठंडी हो रही ।
कुछ धुँध बुढ़िया के आस -पास पालथी मार के  बैठ गयी है।
झोले से डायरी के बचे पन्ने  निकाल कर बुढ़िया ज़ोर ज़ोर से पढ़ रही है। पास बैठी धुँध उसकी प्रेमिल बातों को हैरत से सुन रही । इशारे से दूर खड़े अपने प्रेमी को बुला कर  धुंध ने उसकी बांह पकड़ ली है। उसे चूमे जा रही ।

 अब सांझ होने को है.... कोई प्रेमी जोड़ा आज उसके पास रुका ही नहीं।
  बाकी बचे पन्ने बुढ़िया पहाड़ से उड़ा रही।सिर्फ़ डायरी का कवर  बचा कर रख लिया है जिस पर लिखा है "एक टुकड़ा धूप का" । 
  बुढ़िया उस लिखे को उंगलियों से छू छू कर फिर फिर लिख रही। पास बैठे धुंध के प्रेमी को जाने क्यों गुदगुदी हो रही। वो मंद मंद मुस्कुरा रहा। सोच रहा ....मैं दो बार प्रेमी कब हुआ?
 
 कॉफ़ी आज वापस जा रही। बुढ़िया के ऊपर अब हल्की धूप है । वापसी में लौटते हुए बुढ़िया ने एक टुकड़ा धूप को चूम कर माथे से लगा लिया है। धुँध झोले में जम गयी है।पुरानी प्लेलिस्ट autorepeat पर फिर शुरू हो गयी है।
 
 कल फिर बुढ़िया आएगी या नहीं देखने से पहले रोज़ मेरी नींद खुल जाती है। 
 
लगता तो है आएगी....अभी तो कई किताबें ,कई डायरियों के पन्ने प्रेमियों को तोहफ़े में देने हैं ।इन पहाड़ों से उड़ाने हैं।
 
 आओगी न कल्पना?

1 टिप्पणी:

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"कनेर"  तुम मुझे इसलिए भी पसंद हो कि तुम गुलाब नहीं हो.... तुम्हारे पास वो अटकी हुई गुलमोहर की टूटी पंखुड़ी मैं हूँ... तुम्हें दूर ...