शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

कनेर

"कनेर"  तुम मुझे इसलिए भी पसंद हो कि तुम गुलाब नहीं हो....

तुम्हारे पास वो अटकी हुई गुलमोहर की टूटी पंखुड़ी मैं हूँ... तुम्हें दूर से देखने का अपना सुख है। 

मेरा यूँ छुप कर तुम्हें देखना तुमसे मेरी प्रीत को बरसों से अगाध करते हुए आ रहा। 
तुम्हारा सुनहरा चेहरा  .... अहा 
तुम्हारी ये गहराई...उफ्फ़

काश तुम्हें ये बता पाती कि मन न कह पाने का दुःख कितना ज्यादा है।इस से मुझे मुक्त कर दो न ।

कब से अँखियाँ टुकुर टुकुर देख रही तुम्हारी हँसी ।
तुम कब देखोगे मुझे?

अगली बार उड़ी तो तुमसे बिल्कुल सट कर पास गिरूँगी ....
मैं तुम्हें देखना नहीं छोड़ सकती...मेरी आँखें बस मेरा यही कहा नहीं मानती।

 कनेर... 
तुम मेरे पास नहीं हो पर तुम मेरे पाश में हो।

 

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

"कि क्या तुम मेरे प्रेम में हो?"

नदी समुंदर में गिरने से पहले पूछती है?
तितली फूल को चूमने से पहले पूछती है?
चिड़िया दरख़्त पर बसने से पहले पूछती है?
मुस्कान चेहरे पर आने से पहले पूछती है?
ये धुँध पहाड़ों पर छाने से पहले पूछती है?
ये रेत हवा में उड़ने से पहले पूछती है?

"कि क्या तुम मेरे प्रेम में हो?"

फिर मैं क्यूँ पूछती तुमसे?
मेरा मन था ।
मैं पड़ गयी।

रविवार, 12 जुलाई 2020

रंगबाज़...

मैं अक्सर देखती थी उसे..
उसके हाथों में दस से ज्यादा अंगूठियां हैं।
कलाई में लगभग हर रंग की मन्नत बंधी है।
जेब में कई कई पते हैं ।
अलग अलग तरीके की मुस्कान रखता है ।
 एक पोटली में हज़ारों रंगों की बातें है।
जूतों में अलग अलग शहरों की मिट्टी जमी हैं ।
उसके थैले में रंगीन कंचे हैं जो शायद वो लोगों को दिखा कर वश में कर लेता है।  
उसके पास हर रंग के सैंकड़ों सूखे गुलाब हैं। 
उसकी आँखों में  सात  रंगों का धनुक अटका रहता है। 
और उसके एक उस तिल पर जहां भर की नज़र अटकी रहती है।

एक रोज़ मुझसे टकरा कर उसने आँखें फ़ेर ली। उसका यूँ मुझे नकारना अच्छा सा नहीं लगा। एक बार को लगा कि पूछ ही लूँ देख कर नहीं चल सकते रंगबाज़....?

रंग बाज़ ये नाम क्यूँ सूझा मुझे ? इस सोच में आंखें मूंद ली। हल्की नींद में लगा कि कोई मुझे पुकार रहा। जी में आया कि एक बार को उठ कर देखूं कि कौन है जो ऐसा बेसब्रा है कि सुबह का इंतज़ार भी नहीं कर रहा। पर नीमबहोशी ने मुझे उठने न दिया। कुछ देर में आंखों के साथ आवाज़ भी बंद हो गयी। 
बड़ा सा कैनवास और ढ़ेर रंग और एक खूबसूरत मोरपंखी कूची ....

*क्या बना रही ....

  तुम कौन ?
 
*मैं रंगबाज़

  यहां कैसे?

*अतरंगी हूँ कहीं भी चला जाता हूँ... तुमसे टकराया तो तुम्हारी ही तरफ मुड़ गया।

अच्छा तो अब?

*अब क्या तस्वीर बनाओ मेरी....

 इतने  तो लदे हुए हो।
क्या क्या बनाऊं?
इतनी अंगूठियां क्यूँ?

*वादे हैं।

और ये सतरंगी धागों भरी कलाई?

*ये विश्वास की डोर है।

चेहरे पर इतनी ढ़ेर मुस्कान और ये पते?

*ये तसल्ली हैं।

ये बातों भरी पोटली में क्या है?

*ये .....ये तो शिकायतें - शिकवे हैं।

इन जूतों की मिट्टी?

*ये मिलन और इंतज़ार के बीच का जमा हुआ वक़्त है।

फिर ये कंचे जरूर उदास आँखें होंगी ?

*अरे वाह कल्पना बिल्कुल सही।

जैसे ये सूखे गुलाब निशानियां 

*हाँ....

ये आँखें और वो तिल.... let me guess...
चिठियाँ और  उस पर वो आखरी वाला तुम्हारा /तुम्हारी लिखा हुआ तिल ही है ना।

*😊😊😊
*तुम प्रेम में हो क्या कल्पना?

नहीं 
मैं नींद में हूँ...
रंगबाज़

शनिवार, 11 जुलाई 2020

चुप्पियाँ

मुझसे न बोल कर उसने मुझे अपनी चुप्पियों में घोल दिया।

😊जो भी है मंजूर है।

आओगी न कल्पना....?

आओगी न कल्पना....?

अक्सर ये सपना देखती हूँ....

एक बुढ़िया पहाड़ पर एक ऊंची जगह पर डायरी की पन्ने पलट रही है। बादलों के साथ कॉफी पी रही है। हैडफ़ोन पर बरसों पुरानी प्लेलिस्ट चल रही है। आते जाते लोगों को हाथ हिलाकर मुस्कुरा रही है। 
एक प्रेमी जोड़ा कुछ पूछने के लिए उसके पास रुकता है।फिर वहीं उसके पास बैठा ही रह जाता है। उनसे बातें करते करते वो डायरी के कुछ पन्ने फाड़ फाड़  कर उन्हें पकड़ा रही। जाते वक्त दोनों बुढ़िया का माथा चूम रहे। 
फिर अगले दिन नया जोड़ा 
फिर नया 
और फिर एक नया जोड़ा

बुढ़िया की डायरी के पन्ने खत्म होने को हैं ... 
हल्की से थोड़ी ज्यादा ठंड को अपने कोट में दबाये हुए बुढ़िया आज फिर किसी प्रेमी जोड़े के इंतज़ार में है...
Coffee भी आज इंतज़ार में रुक-रुक कर ठंडी हो रही ।
कुछ धुँध बुढ़िया के आस -पास पालथी मार के  बैठ गयी है।
झोले से डायरी के बचे पन्ने  निकाल कर बुढ़िया ज़ोर ज़ोर से पढ़ रही है। पास बैठी धुँध उसकी प्रेमिल बातों को हैरत से सुन रही । इशारे से दूर खड़े अपने प्रेमी को बुला कर  धुंध ने उसकी बांह पकड़ ली है। उसे चूमे जा रही ।

 अब सांझ होने को है.... कोई प्रेमी जोड़ा आज उसके पास रुका ही नहीं।
  बाकी बचे पन्ने बुढ़िया पहाड़ से उड़ा रही।सिर्फ़ डायरी का कवर  बचा कर रख लिया है जिस पर लिखा है "एक टुकड़ा धूप का" । 
  बुढ़िया उस लिखे को उंगलियों से छू छू कर फिर फिर लिख रही। पास बैठे धुंध के प्रेमी को जाने क्यों गुदगुदी हो रही। वो मंद मंद मुस्कुरा रहा। सोच रहा ....मैं दो बार प्रेमी कब हुआ?
 
 कॉफ़ी आज वापस जा रही। बुढ़िया के ऊपर अब हल्की धूप है । वापसी में लौटते हुए बुढ़िया ने एक टुकड़ा धूप को चूम कर माथे से लगा लिया है। धुँध झोले में जम गयी है।पुरानी प्लेलिस्ट autorepeat पर फिर शुरू हो गयी है।
 
 कल फिर बुढ़िया आएगी या नहीं देखने से पहले रोज़ मेरी नींद खुल जाती है। 
 
लगता तो है आएगी....अभी तो कई किताबें ,कई डायरियों के पन्ने प्रेमियों को तोहफ़े में देने हैं ।इन पहाड़ों से उड़ाने हैं।
 
 आओगी न कल्पना?

कनेर

"कनेर"  तुम मुझे इसलिए भी पसंद हो कि तुम गुलाब नहीं हो.... तुम्हारे पास वो अटकी हुई गुलमोहर की टूटी पंखुड़ी मैं हूँ... तुम्हें दूर ...