सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

प्रेम

प्रेम हमेशा से दिशा को ही पहचानता था इस लिए गति और वेग से बेपरवाह रहा। आगे का मतलब दूर भी होता है अगर प्रेम से देखोगे तो।
लिखा हुआ ही दिखे या देखा हुआ ही लिखा जाए .... जरूरी तो नहीं.... प्रेम शर्त भी तो नहीं पहचानता।



और आखिरकार हम प्रेम में उसी के होते जाते हैं जो रोज़ हमें ही चुनता है।

जब प्रेम की खुश्बू कम होने लगती है जाने क्यों कागज़ पर इत्र गिरने लगता है।



अपना मन खुद अपने हाथों से तोड़ लेना ...
बेहतरीन इलाज है और बेजोड़ हुनर भी।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

लिपि

दुःख .... छोटी लिपि का अत्यंत बड़ा शब्द