सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

उदासी ....

उन आँखों में चाहे मेरे लिए रत्ती भर जगह न थी पर पड़ाव बेहिसाब दिखते थे।
मुझे रुक जाने से बेहतर लगा रुक रुक कर साथ चलना।
फ़िदा हूँ।
हमेशा रहूँगी।

मेरी कविता भी रोज़ उसी जगह से टूटती है जहां से तुम्हारी कहानी जुड़ती है।



मेरी सबसे पसंदीदा जगह?
तुम्हारे संग संवाद में होना

हम अपने दुःख खुद बुनते हैं.....
सूरज से चाँद मांग कर
और चाँद से प्रेम

कहानियों का क्या है..... कहीं भी उग आती हैं।
प्रेम थोड़े ही है जो दब जाएगा।
ख़्वाब रखने थे ....
ज़रा सी देर अपनी हथेलियां छूने दो।


वो श्वेत - श्याम रंग से बनती है पर लिखी रक्त से जाती है।

याद के नाम पर मेरे पास दो मुलाकातें और एक मुड़ा हुआ पन्ना है
बेहद अनमोल....

मन रखने के लिए नहीं लिखती ...
कहने का मन रखती हूँ 
बस इसलिए लिखती हूँ।


बहुत दिनों से उदासी नहीं लिखी.... 
एक बार फिर मुकर जाओ ना ।

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लिपि

दुःख .... छोटी लिपि का अत्यंत बड़ा शब्द