सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

रूमान ...

पहाड़ को हमेशा नदी मिली और ....
शब्दों को संवेदना
दिन की रात हुई
ऐसे की जैसे मन की याद
दीपक ने बस बाती को चाहा
सागर ने लहर को
दिल धड़कन के लिए रुका
स्पर्श हथेलियों में
रंग कूँची में डूबे
तो संगीत लय में
चाँद चांदनी में खिला
ये पन्ना उस किताब से
फूल ने डाली को माना
प्रेम ने उदासी को
पंख उड़ान संग सोये
ख़्वाब नींद संग
रूमान लिखना कितना तो आसान है बस पुरुष वाले शब्दों को स्त्री वाले शब्दों के साथ करीने से ही तो लगाया है।
एक बिंदु कुछ लकीरें
जैसे तुम और मैं

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