मंगलवार, 16 अक्तूबर 2018

हमेशा....

तुमने हर बार मुझे कम दिया और मैंने हर बार उससे भी कम तुमसे लिया।

ना तुम कभी ख़ाली हुए ....
ना मैं कभी पूरी हुई।

हम यूँ ही बने रहें....हमेशा

मेरी कविता ?

मेरी कविता ?

वही जो रोज़ मेहँदी, महावर ,सिंदूर ,काजल से लिखी और फिर बहा दी जाती है.....

इसीलिए शायद अथक रहती है।
पहुंची क्या ?
आज भेजी तो है।

सोमवार, 15 अक्तूबर 2018

मिलन......

भीग जाने के लिए मेरे पास पहाड़ बहुत थे .....
फिर तुम्हारी रेतीली आंखों से मिलना हुआ...


प्रेम

प्रेम हमेशा से दिशा को ही पहचानता था इस लिए गति और वेग से बेपरवाह रहा। आगे का मतलब दूर भी होता है अगर प्रेम से देखोगे तो।
लिखा हुआ ही दिखे या देखा हुआ ही लिखा जाए .... जरूरी तो नहीं.... प्रेम शर्त भी तो नहीं पहचानता।



और आखिरकार हम प्रेम में उसी के होते जाते हैं जो रोज़ हमें ही चुनता है।

जब प्रेम की खुश्बू कम होने लगती है जाने क्यों कागज़ पर इत्र गिरने लगता है।



अपना मन खुद अपने हाथों से तोड़ लेना ...
बेहतरीन इलाज है और बेजोड़ हुनर भी।


मैं लिखना नहीं जानती ...

सही कहते हो ......
मैं लिखना नहीं जानती 
मैं तो सिर्फ पीना जानती हूँ ...
कुछ समुन्दर खारा सा 
कुछ अँधेरा उतारा सा
अपने शब्दों के straw से
कभी इक सांस में
कभी बस गुड़- गुड़ में

कागज़ में कहाँ मिलूंगी मैं ?
शब्दों में कहाँ दिखूंगी मैं ?
मैं तो दिखूंगी बीती रात की बाती में
या शायद किसी उदास पाती में

हाँ ....मैं लिखना नहीं जानती
पर मैं छूना जान गयी हूँ
जीना जान गयी हूँ

नैना ...अभी

लड़की ने स्कार्फ बाँधा, स्कूटर स्टार्ट किया और चली गयी. अचानक मदभरी छाया की जगह धूप खिल आई. एक सन्नाटा पसर गया. स्वप्न में हवाई जहाज क्रेश होते बचा और आँख खुल गयी. ....
Kc Sir की इस कहानी को यहां से अपनी तरह से आगे बढ़ाया । पहली कोशिश.... ऐसा कभी लिखा नहीं पर मन है कि मैं भी किसी रोज़ कहानियां बुन सकूँ । पढ़ के देखिए तो...
अक्सर आँख खुल जाने पर टूट जाने वाले सपने वहीं से शुरू होते हैं जहां छूटे हों। पर जाने क्यों ये वाला पलट कर फ़िर उसी पंक्ति पर जाकर बैठ गया जहां पर लड़की ने स्कार्फ़ बांधा था। स्कूटर फ्लैशबैक में गया तो पर इस बार स्टार्ट होने से मुकर गया।अपनी ही आवाज़ को पहचानने से इनकार कर दिया हो जैसे। गर्रर गर्र की आवाज़ के बीच अभिमन्यु अब भी सुनो, excuse me ,hello जैसे शब्दों को सुनने की कोशिश कर रहा था।वो चाह रहा था कि शोर रुके और कोई आवाज़ आये ।जान बुझ कर वो पीठफेर कर दूसरी तरफ़ देख कर सिगरेट सुलगाने लगा ।उसने शायद कहीं पढ़ा था पीठ फेर लो तो लोग छू कर बुलाते हैं ।इशारे से नहीं।
आवाज़ क्या है ? शायद कुछ ज्यादा शोर या कुछ कम शब्द । लड़की ने कम शब्दों को चुना... आप अभिमन्यु हो ना ? अभिमन्यु अब भी गर्र गर्र में खोया हुआ था और मीठे धुएं से एक आवाज़ बनाने की कोशिश में लगा था।
हल्का स्पर्श जब मीठी सी आवाज़ से मिल जाए तो स्पंदन ही कहलाता होगा या फिर ...
सुनिए जरा।आप अभिमन्यु ही हो ना ।बुरा न माने तो एक सिगरेट मिलेगी ।ये स्कूटर भी ना .....धोखा दे गया।
धोखा और सिगरेट पर्यायवाची भी थे ये पता तो था पर सिद्ध उसी दिन हुआ।
Sure ...
जी मैं "अभी "... I mean Abhimanyu.
बची हुई दो सिगरेट केस खोल कर
आगे बढ़ा कर अभिमन्यु मन ही मन खुद पर हंसने लगा .... यारा नाम छोटा कर देने से दूरी कम नहीं होती। मौसम तो चक्कर लगाने से ही बदलते हैं । "अभी " अभी तो दिन का "द" भी नहीं निकला।
सिगरेट होठों से दबाए हुए दोनों हाथों से स्कार्फ़ खोलते हुए लड़की बेहद casual अंदाज़ में बोली I am Naina ....Second year same college. Science लेनी पड़ी क्योंकि घरवाले humanities को पढ़ाई नहीं समझते I am into dance and drama.
अभिमन्यु तो नैना सुनकर ही फ्रीज हो गया। बाकी की सारी बातें वहीं चहक कर सामने की चाय की टपरी पर जम गयी।
नीले रंग का टॉप और सफेद long स्कर्ट ... white शर्ट और ब्लू जीन्स ।
कॉम्बिनेशन्स सामने से देखने में दो ही रंग थे पर इनके बीच कई रंगों की कहानियाँ तैरने लगी थी ।
Poles apart ...पहली कहानी
शायद इस लिए भी ...दूसरी कहानी
कभी यूँ भी तो हो...तीसरी और भी न जाने कितनी।
लिखने के अलावा आप और क्या करते हो अभी ?
अभी ? तो मैं सिर्फ़ आपको देख रहा हूँ ... ये कह ही देता अभिमन्यु कि अचानक उसको लगा दिन का "द" शायद हिलने तो लगा ...
"अभी" ? उसका निकनेम लेकर पूछ रही थी नैना।
जी फिलहाल तो अपनी किताब पर प्ले की तैयारी है। कुछ किरदार उलझे हुए हैं कुछ खोए हुए ।उन्हीं को खोज रहा हूँ। चाय के कप कब भरे कब खाली हुए ये कोई नहीं जानता । हाँ कितने बार खाली हुए कितनी बार भरे ये टपरी वाले को जरूर हिसाब था जब उसने कहा होते तो 40 है पर आप 50 दे दो।पिछले बार के 10 बचे हैं।
नैना ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी ... 10 बच्चे हैं ?
किसके भाई?
शायद तुमसे कह रहा अभी। कल मिलती हूँ । तुम्हारे प्ले की कहानी सुनूँगी।
अभिमन्यु अभी सिगरेट के छल्ले और चाय की प्याली से उभरा ही था कि नैना फ़िज़ा में ढ़ेर सारी हँसी बिखेर कर उड़ गयी ।
इस बार स्कूटर भी मुआ चुपचाप बिनाआवाज़ चल पड़ा।जैसे नैना की बातों पर मुंह दबा कर हँस रहा हो।
शाम के बाद ही रोज़ाना रात आती थी .. उस दिन शाम को टाप कर सीधे रात ही हो गयी हो जैसे।
अभिमन्यु कत्तई आँखें मत खोलना ... नैना आ जाएगी।कल उसी हँसी के आगे से शुरुवात करेंगे।
मुस्कुराते हुए अभिमन्यु उठा और रेडियो को और पास सरका लिया ।
RJ गिन्नी भी ना ......उस तरफ से चहक कर बोली नैना के ऊपर जो 5 गाने गा देगा उसे गिफ्ट hamper फ्री... आप सब सोचिए और तब तक सुनिए ये गाना ...तेरे नैना बड़े कातिल मार ही डालेंगे।
अभी ? सो गए क्या ?



अभि नैना continues....
किसी को किसी में ढूंढ लेना प्रेम की बुरी आदत है।
वो कितना भी उसका नाम "क " से शुरू करना चाहे वो हमेशा "अ" से ही शुरू हो सकता था ।
"अभिमन्यु" .....तुम्हें देख कर कोई भी कह सकता है कि तुम एक साथ बहुत सारे लोगों को खुश रखने में माहिर हो। इतनी कहानियां कैसे और कहाँ ढोते हो?
नैना ने अपने रेशमी बालों को ऊन का गोले सा कर दिया।
अभिमन्यु की नज़र किताब के बावनवे पेज से उठी तो नैना की झूलती लट पर टिक गयी। उसके जी में आया कि कहे नैना बस एक पल तुम आंखें बंद कर लो मैं तुम्हें चूमना चाहता हूँ ।
"just freeze नैना "
उंगलियों में कलम नचाते हुए बेहद करीब आकर नैना के कानों में वो फुसफुसाया ....दिलबर यूँ कहानियाँ कैद न किया करो । और उसी पेन से उसने बंधा ऊन का गोला रेशा रेशा कर दिया।
नैना ने सब कुछ सुना बस "दिलबर " सुनकर भी अनसुना कर गयी।
ओहहो ! यानी जिस तरह खूबसूरती रोकी नहीं जा सकती... वो सरकती रहती है। ठीक वैसे ही कहानियाँ भी नहीं रुकती क्या "अभी" ? नैना चहक कर बोली
अब इसका क्या जवाब देता अभिमन्यु । अपनी कुछ देर पहले की गुस्ताखी को छिपाने के लिए उसे जेब में रखी सिगरेट सुलगानी पड़ी। धुआं लाख रोकने पर भी नैना की तरफ ही जा रहा था ।बेसब्रा कहीं का।
और सारी राख पास रखी किताब से यारियां बढ़ा रही हो जैसे।
नैना ये धुआं देख रही हो .... ये कहीं नहीं जाता अगर कैद कर के रखना चाहो तो ।ठीक वैसे ही ये कहानियां भी। अच्छा ये बताओ धुआं लिखा है कभी?
नैना ने "अभि" की सांस लेती सिगरेट ऐशट्रे से उठाकर अपने होठों पर धर दी। कश दिलकश भी होती है ये अभिमन्यु ने आज ही देखा था। कलम से कुछ देर की बातें पास रखे कागज़ पर नैना लिख कर बोली ....
लो तुम्हारा धुआं वापस कर रही। फिर मिलूंगी अगली बार "क" से कविता लाती हूँ
उस रोज़ अभिमन्यु कुछ सुनता रहा देर रात तक ....
शायद नैना का कागज़ जो सामने नीले बोर्ड पर मुस्कुरा रहा था।
"उनके आसपास और शायद दरमियाँ भी ढ़ेर सारा धुआं जमा रहता।वह उसे कहानियों में भर लेता और वो उसे नज़्मों में काढ़ लेती। अब उनके बीच कई पुल हैं...वो भी धुआं धुआं
या शायद
फिर एक बार कहानियों में आज बरसों बाद नज़्म गुम है और हर नज़्म में फिर एक मुकम्मल कहानी
कागज़ पर धुआं लिखना कितना आसान है पर प्रेम को रोके रखना कितना मुश्किल...
नैना
अभिमन्यु मुस्कुराया और उसी कागज़ की आखिरी बची कुछ ख़ाली जगह पर ये लिख कर सो गया...
"अभी और नैना के बीच "क " वाली कहानी रुक जाए काश।"

सम्मोहन .....

तुम्हारी कहानी और मेरी कविता में हमेशा से सिर्फ़ एक चीज़ common थी ...
वो शुरुवात वाला "क" ।

थोड़ा सा शहर बचा है ...ले जाओ

प्रेम से इत्र सिर्फ़ एक बार गिरता है ....उसके बाद हर प्रेम से सिर्फ़ सूखी पंखुडियाँ झरती हैंl

उनके आसपास और शायद दरमियाँ भी ढ़ेर सारा धुआं जमा रहता।वह उसे कहानियों में भर लेता और वो उसे नज़्मों में काढ़ लेती। अब उनके बीच कई पुल हैं...वो भी धुआं धुआं
या शायद
कहानियों में आज बरसों बाद नज़्म गुम है और हर नज़्म में फिर एक मुकम्मल कहानी
कागज़ पर धुआं लिखना कितना आसान है पर प्रेम को रोके रखना मुश्किल... वो भी कागज़ पर 

बिखरते हैं ........खुद को समेट लेते हैं
कुछ हैं ........कुछ लकीरें कुरेद लेते हैं

उन दो लोगों में एक की जगह हमेशा ख़ाली थी।
प्रेम और अप्रेम इस वाक्य की डाली पर साथ खिल रहा।
देखिए तो...

मेरे पास लौटने के लिए तुम्हारा वाला शहर नहीं था और तुम्हारे पास मेरा वाला मौसम
ताउम्र एक ही ज़ख्म कब तक धड़कता ?
चारागर बदलते रहे ... सांस आती रही।
धीरे धीरे खत्म और जल्दी जल्दी शुरू होने वाला सम्मोहन .... देखिये प्रेम तो नहीं?

नुक्स....

वीराने ख़र्च करने के लिए कागज़ से सस्ता शहर नहीं।
चले आओ....

अभी अभी एक शब्द की नज़्म मिली....
हूबहू तुम्हारे नाम वाली

विचलित मन लिखना था ....
तुम्हारी परवाज़ पर धर दूँ क्या?

कितने ही समुंदरों की स्याही सोख लेगा.......
ये साथ लिखा तुम्हारा मेरा नाम

दुःख ....
मन में नहीं उंगलियों के पोरों पर धरने के लिए जन्मे हैं।
टिकाए रहो।
दर्द बना रहे तो आँख खुली रहती है।


बस चार ही मौसम का था अपना बसंत
हरा
पीला
सुनहरा
भूरा
बाक़ी बस दो दरख़्त थे ....कायम से।

बर्दाश्त लिखूँ?
चलो छोड़ो प्रेम ही लिख देती हूँ।
कम में ज्यादा लिखा जाएगा।


ये क्या कम नुक्स है मुझमें कि मैं शख्स से ज्यादा उसके शब्द को उसमें तलाशती हूँ।
मेरे प्रेम की उम्र किरदार नहीं ....उनके बीच के चलने रुकने वाले शब्द आगे बढ़ाते हैं।

रूमान ...

पहाड़ को हमेशा नदी मिली और ....
शब्दों को संवेदना
दिन की रात हुई
ऐसे की जैसे मन की याद
दीपक ने बस बाती को चाहा
सागर ने लहर को
दिल धड़कन के लिए रुका
स्पर्श हथेलियों में
रंग कूँची में डूबे
तो संगीत लय में
चाँद चांदनी में खिला
ये पन्ना उस किताब से
फूल ने डाली को माना
प्रेम ने उदासी को
पंख उड़ान संग सोये
ख़्वाब नींद संग
रूमान लिखना कितना तो आसान है बस पुरुष वाले शब्दों को स्त्री वाले शब्दों के साथ करीने से ही तो लगाया है।
एक बिंदु कुछ लकीरें
जैसे तुम और मैं

स्वार्थी न लगे प्रेम ......

ख़ुद से बातें करने का एक ही शौक उसे सबसे अलग करता था। उसे पल लिखने की आदत थी।वह अक्सर अपने लिए ही ख़त लिखा करता था पर उदासी उसके चाहने वालों तक पहुंच जाती थी। पते वाली जगह पर उसके तीन अक्षर वाले नाम भर ही जगह बची रहती थी पर न जाने कैसे जो कोई उसे पढ़ता वह ये सोच कर जी जाता कि उदासी उसके नाम आयी है।सब उसका नाम खुरच कर अपना नाम लिख देते थे।
उदासी के आदी लोगों को उससे अपार प्रेम था
और उसको सिर्फ़ खुद से और खुद से।
दो बार खुद से ...खुद से इसलिए लिखा कि ख़ुद से बातें करने का एक ही शौक उसे सबसे अलग करता था। उसे पल लिखने की आदत थी।वह अक्सर अपने लिए ही ख़त लिखा करता था पर उदासी उसके चाहने वालों तक पहुंच जाती थी। पते वाली जगह पर उसके तीन अक्षर वाले नाम भर ही जगह बची रहती थी पर न जाने कैसे जो कोई उसे पढ़ता वह ये सोच कर जी जाता कि उदासी उसके नाम आयी है।सब उसका नाम खुरच कर अपना नाम लिख देते थे।
उदासी के आदी लोगों को उससे अपार प्रेम था
और उसको सिर्फ़ खुद से और खुद से।
दो बार खुद से ...खुद से इसलिए लिखा कि स्वार्थी न लगे प्रेम ।

उदासी ....

उन आँखों में चाहे मेरे लिए रत्ती भर जगह न थी पर पड़ाव बेहिसाब दिखते थे।
मुझे रुक जाने से बेहतर लगा रुक रुक कर साथ चलना।
फ़िदा हूँ।
हमेशा रहूँगी।

मेरी कविता भी रोज़ उसी जगह से टूटती है जहां से तुम्हारी कहानी जुड़ती है।



मेरी सबसे पसंदीदा जगह?
तुम्हारे संग संवाद में होना

हम अपने दुःख खुद बुनते हैं.....
सूरज से चाँद मांग कर
और चाँद से प्रेम

कहानियों का क्या है..... कहीं भी उग आती हैं।
प्रेम थोड़े ही है जो दब जाएगा।
ख़्वाब रखने थे ....
ज़रा सी देर अपनी हथेलियां छूने दो।


वो श्वेत - श्याम रंग से बनती है पर लिखी रक्त से जाती है।

याद के नाम पर मेरे पास दो मुलाकातें और एक मुड़ा हुआ पन्ना है
बेहद अनमोल....

मन रखने के लिए नहीं लिखती ...
कहने का मन रखती हूँ 
बस इसलिए लिखती हूँ।


बहुत दिनों से उदासी नहीं लिखी.... 
एक बार फिर मुकर जाओ ना ।

मुलाक़ात.....

पिछले दिन की देह त्याग कर मैं रोज़ नए मन को जन्म देती हूँ।
अपना दिन मैं खुद तय करती हूँ।

मेरी जाती हुई निगाह कितने भी प्रश्न ढोये .....
लौटती नज़र खाली हाथ ही आती है।
सुनो!

तुम्हारी नीली कमीज़ की जेब में उस दिन मेरी धूप रह गयी होगी शायद ....
देखो smiley खिल ही नहीं रही।

लिहाज़ ......
कागज़ पर रख दूँ तो श्रृंगार
आत्मा में रख दूँ तो यलगार

सुनो ना....
उस शख्स में मैं कम तुम ज्यादा थे।
हल्का हल्का सुरूर क्या क्या लिखवा देता है

लो मेरे एकांत से कुछ शब्द ले जाओ ...
अबोला प्रेम पूरा लिख लो।


कुछ मुलाकातें लफ़्ज़ों में बयां नहीं होती...
बस आँखों का इंतज़ाम भर होता है।
अगली किश्त मिलने तक



अब हल्की हल्की जरूरत महसूस होने लगी है ....
उसे छूते हुए मैंने सोचा
शाल मुस्कुराई और पश्मीना हो गई

हथेली में कल वाली मुलाक़ात रख कर तुम मुझे और भी चटक कर गए...रंगरेज़
मेरी मुस्कान में एक तुम ही हो जो अनगिनत इंद्रधनुष बाँध सकता है...बिना छुए
शुक्रिया तुम्हारा


दरख़्त.....



दरख़्त इसलिए भी दरख़्त रहता है कि उसने खुद में ज्यादा पत्तियां ,उससे कम शाखाएं और सबसे कम जड़ों को रखा।
पत्तियों की इस बात पर वो हमेशा हैरान परेशान रहा कि ये सुंदर तो हैं पर जाने क्यों रंग बदल देती हैं ? मौसम इन पर असर कर जाता है । ये साथ देते देते एक दिन थक क्यों जाती हैं?
ठीक वैसे ही जैसे हमारे आसपास रोज़ाना वाले चेहरे । जो मानी तो रखते है पर किसी भी पल बेमानी हो जाते हैं।बदलते रंग एक फीकापन एक ठूंठ तैयार रखते हैं।
इन ढ़ेर सारी पत्तियों का बोझ कुछ कम पर ताकतवर भुजाएं अपने ऊपर लेती हैं ।पेड़ इन्हें प्यार से शाखा बुलाता है और हम रिश्ते।
शाखा जब टूटती है तो दरख़्त अपने एक बड़े खूबसूरत हिस्से को खो देता है ।टूटे रिश्तों को कोई नहीं भर पाता ।दरख़्त भी अपनी शाखा की याद में कई दिनों तक सुन्न हो लेता है। रिश्ते शांत हो जाते हैं।
एक बीज और उससे निकले कुछ रेशे। फिर जो उससे उपजा मायाजाल बस उन्हीं में रम गया दरख़्त ।जड़ हो गया हो जैसे । सबसे कम पर स्थिर। ऐसे की जैसे हमारा प्रेम ।हमारा फ़ख़्र।
जुड़ा हुआ ,गुँथा हुआ, छिपा हुआ पर अडिग।
हम अपने लिए पत्ती , शाख या जड़ क्या ढूंढें?
हममें कितनी पत्तियां ,कितनी शाखाएं और कितनी जड़ अभी शेष बाक़ी हैं और हम उनको खुद में बनाये रखने के लिए क्या क्या कर रहे हैं ? और क्या क्या नहीं कर रहे?
हम खुद कितनों की पत्तियां ,कितनों की शाख और कितनों की जड़ हैं?
हम खुद के लिए क्या हैं -पत्ती, शाख,या जड़? हैं भी या ढोंग कर रहे?
पत्ती ,शाख और जड़ को आरोही क्रम में और घटते क्रम में रखने और संजोए रखना हमें हरा रखेगा।
ये गणित के सवाल जैसा है कठिन...पर असल में ज़िन्दगी का हल है और लभ्य भी।
ये पत्तियां,
चुनिंदा शाखाएं
बस एक जड़
अलभ्य नहीं हैं।

इत्र ......

फ़ितूरी हैं ये आँखें .....
एक तुम्हारे ही इत्र से कजरारी रहना चाहती हैं।

था तो था....

वो चाहे हमेशा से एक चिड़िया थी पर उसका एक मदारी था।
था तो था....

नीला मौन ....

फासले उसके बोए हुए थे ....
प्रेम मेरा रोपा हुआ......
नीला मौन उगा क्या कागज़ पर ?

सुनो....शुक्रिया !

प्रेम कितना भी क्यों न सिकुड़ जाए ....
सुनो....शुक्रिया !
कह देने भर की जगह होठों के बीच बची रहनी चाहिए।

मनमर्जियाँ....

ये कविता.... ये कहानियां ज़िन्दगी के उदास दरवाज़े और खुशनुमा खिड़कियां ही तो हैं जो पहले अंदर की ओर खुलते हैं फिर बाहर को।
और तो और झोंका भी अंदर से बाहर को ही होता है।

शब्द हमेशा से मनमर्जियाँ ही करते होंगे ना।
खुलकर बंद होते
बंद होकर खुलते

लिपि

दुःख .... छोटी लिपि का अत्यंत बड़ा शब्द