सोमवार, 4 जून 2018

भरम

बंद आंखों से तुम्हें देखना और ठीक ऐसे ही तुम्हें सुनना .....
मैं हमेशा कहती हूँ ....
मुस्कुराने के लिए तुम्हें सोचती और सुनती हुई दो आँखें चाहिए....
दो गुलाबी पंखुड़ियां तो सिर्फ़ जुड़ना जानती हैं...... आज़मा कर देखिए इन आँखों को।




तुम मेरे लिए क्या हो कल्पना ?
उस रोज़ मुड़े पन्ने ने मुझसे पूछा ....
टीस और खनक ....
बस दो ही शब्दों से बनी
आज कहानी ....
कल ग़ज़ल हूँ तुम्हारी 
मैंने मुस्कुराते हुए कहा।


तुम्हारे बेहद पास से गुज़रने के लिए उड़नखटोला ही चुनती हूँ .... कल्पना वाला
जाकर .......वापस भी तो आना होता है।



उन्होंने कभी "हाँ"नहीं कहा.... बस जो मैंने कहा उसमें एक शब्द ऐसा जोड़ दिया कि वो हूबहू हाँ जैसा भरम पैदा कर दे। 
ये उनकी कारीगरी नहीं हो सकती । ये बेशक कुछ ऐसा है जो उनको मेरे लिए रुका हुआ ही खूबसूरत लगता है । बैराज के उस तरफ का रुका हुआ पानी हो जैसे।
कभी सोचती हूँ शायद पा लेने से ज्यादा कठिन है "कहीं इसे भी खो ना दूँ" वाले डर को जीना। 
देखिए आपको भी "ना "नहीं ...अभी अभी "हाँ" ही सुनाई दिया होगा ।
बैराज खुला है पर बहेगा नहीं .....
ये वाला भरम बहुत तीखा है पर जिंदा तो है
और मेरे जैसा जिद्दी भी।


उम्मीद के कुछ टुकड़ों पर काई और कुछ पर कांटे उग आये हैं...
तुम कब खिलोगे चाँद ?








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यात्रा

प्रेम सबसे कम समय में तय की हुई सबसे लंबी दूरी है... यात्रा भी मैं ... यात्री भी मैं