रविवार, 24 जून 2018

हम बुद्धधु हैं क्या ?

याद नहीं हमने कभी एक दूसरे को कोई ख़त लिखा हो।
हाँ... खामोशियाँ आदतन रोज़ भेजी।
रेत घड़ी हमारा डाकिया थी हर बार।



मुझमें नायाब जैसा कुछ भी नहीं ...
बस कुछ अर्ज़ियाँ हैं जो सफेद स्याही से लिखी गईं हैं .... गुपचुप
और लौटी भी हैं बड़ी चुप चुप

राहत आसान थी पर मैंने उस मन का प्रेम चुना जो मेरे लिए मूक था।
राह नहीं ....मुझे राही पसंद था ....
अपना पसंदीदा प्रेम अनलिखा हो चाहे अनकहा भी.... अपनी तरफ ही आता सा लगता है।
हम बुद्धधु हैं क्या ?
शब्दों से सपने देख लेते हैं।
धत्त!

😊😊😊
वो कहते जाते हैं...
हम होते जाते हैं।
ऐब हमारा तो है ही .....हुनर उनका भी कुछ कम नहीं ।

तुमसे मिली तो जाना...
मिलकर पाने और पाकर मिलने में बहुत फ़र्क़ है।
मेरी इस बेफिक्री का .....
ना तो लहज़ा है ...ना ही ज़ायका
जाने क्यों....... लोग मुझे ग़ज़ल कहते हैं ?

सुनो....
कुछ नए पत्ते टांक जाते मुझमें।
थोड़ा रुककर
बहुत सारा बोल जाते मुझमें

उदासी की अरज... खुद से

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

बिम्ब

एक शब्द लिखकर सैंकड़ों बिम्ब देखोगे? लिखो.... "प्रेम" मैं चुप थी पर चुप्पी कभी नहीं थी मेरे पास अब बस चुटकी सा दिन बचा है । अप...