सोमवार, 4 जून 2018

दस्तूर

कागज़ पर ही मिलते हो .......कागज़ पर ही छूट जाते हो
इसे सिलसिला कहूँ या कविता?



"जाना" इसलिए भी एक कठिन प्रक्रिया है क्योंकि तुम्हारे लिए तो दर हमेशा खुला है और मेरे लिए तो खिड़कियां तक बंद हैं।


पिंजड़ा ही हूँ ....
बस मुझमें सलाखें दिखती नहीं ।


कितनी कल्पना ....
कितना सच......
वो पुरानी वाली औरतें
जितनी कल्पना.....
उतना सच....
ये नई वाली स्त्रियाँ
रात काटी नहीं पाटी गई है.....नाखूनों से खुरच कर
सुख़न लाज़मी है।
दुनिया को ज़माना होते देर ही क्या लगती है ?
बस नज़रें ही तो फेरनी है।

उसे पहले से ही किसी की शिकायतें पसंद नहीं थी ।फिर सारी प्रार्थनाओं से भी वह उचट गया।
उसे जवाब ना देने की अजीब बीमारी थी । उसने संवाद वाला प्रेम कभी अपनाया ही नहीं। शब्दों को गुमशुदा कर देना उसकी बेहतरीन आदतों का हिस्सा था।
उसे अपनी सारी प्रेमिकाएं मूक ही पसंद थी।
निर्मोही ! तुम्हारे शब्दों का इंतज़ार रहेगा।
प्रेम तुम्हारे हिस्से में भी कम ही रहे। खर्च न हो।

मैं उससे बंधी हूँ ... पर वो मुझसे मुक्त है।
कुछ कीलें चुभती नहीं पर टेक जरूर देती हैं।

सोचती थी बदल लूंगी तुमसे अपनी हसरतें .......
पर तुम तो मेरे ही कायल हो चले
अब .....खुद को खुद से क्या बदलना

स्त्री ने हर बारअपने लिए दस्तूर चुना .... और पुरुष ने हर बार शऊर ।

एक देखती चली गयी ........दूसरा दिखाता चला गया।




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