बुधवार, 6 जून 2018

प्रेम

सुनो ....
तुम्हारी कहानियों में अल्पविराम पूर्णविराम बन जाऊँ क्या ? 
अच्छा लगता है तुम्हारे आस पास बने रहना



लौट कर आने के लिए शब्दों से अच्छी सराय नहीं और कविता से खूबसूरत बाहें नहीं .....



मुझे विदा दो.....
ये कहकर उसने प्रेम आसान कर दिया.......

तुम्हारी भेजी "हाँ" मिली ....
मेरी पहुंची क्या ?


"क्यों" पूछते पूछते और "क्योंकि" बताते बताते उनका प्रेम एक दिन मूक बधिर हो गया।
प्रश्न खुद से ज्यादा हों तो दूसरों से संवाद बना रहता है।
घात नहीं मोहपाश हों प्रश्न....

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