सोमवार, 4 जून 2018

रूमानी शाम

जितनी दूर तक लिखते जाओगे....दर्द उतनी देर तक पढ़ा जाएगा।
लाओ..... संभाल कर रख दूँ।


सुनो ! मेरे हिस्से में समन्दर बहुत है .....
लाओ ....अपना सूरज रख दो
इक रूमानी शाम मैं भी पहन कर देखूं ।



बेहद करीब से देखेंगे तो पाएंगे कि रोज़ हम सिर्फ अपने लिए ही लिखते हैं....फिर बस लिखते ही चले जाते हैं और एक दिन अपना ही लिखा यहां वहां रख कर भूल जाते हैं।
या फिर
बेहद करीब से देखेंगे तो पाएंगे कि रोज़ हम सिर्फ अपने लिए ही जीते हैं....फिर बस जीते ही चले जाते हैं और एक दिन अपना ही जीवन यहां वहां रख कर भूल जाते हैं।



इन आँखों में ख्वाइशों का बोझ कब तलक संभालूं?
चले आओ....... तो कुछ रात चले ।




मुझ से निकलकर कहीं तो जाता ही होगा मेरा सन्नाटा...
शायद कैनवास पर या ....कोरे कागज पर
सन्नाटा बदरंग लाख हो मेरा पर जब दर्ज़ होता है तो क्षितिज .....लाल 
हर्फ........ लाल 
स्याहि ....लाल 
रक्त ........लाल 
और शायद मेरा पूरा वजूद लाल।

बोलते लाल रंगों में ज़िंदा रहना सीख गयी हूँ।मैं खुश रहना सीख गई हूं। 
ज़िन्दगी का विकल्प हो तो हो .... मेरा कोई नहीं।
मैं सिर्फ मैं हूँ.... सुर्ख़ चाँद सी।



एक दिन के सुकून को फिर बाक़ी तीन सौ चौसठ उदासियों में लिख देना .....प्रेम ही होता होगा शायद।

मैं तो अंदाज़न कह रही।




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तुमने हर बार मुझे कम दिया और मैंने हर बार उससे भी कम तुमसे लिया। ना तुम कभी ख़ाली हुए .... ना मैं कभी पूरी हुई। हम यूँ ही बने रहें....हमेश...