रविवार, 24 जून 2018

तसल्ली

जब कहीं भी नहीं रहने का मन करता था वो लुप्त हो जाती थी... कविता में
"शरण " शब्द .... कुछ इस तरह लिखा हुआ कितना खूबसूरत है ।


रो पड़ने के लिए आँसू नहीं....
ढ़ेर सारा मन चाहिए


अपने ही दुख को रेशा रेशा अलग करना और फिर उसे गूंथ कर खुद का श्रृंगार कर लेना ही औरत हो जाना है।
ये ना तो हार है ना जीत .....
ये फ़ख़्र है जो आखिरी सांस तक औरत बांचती रहती है बिना लब हिलाए।
कोई सुन ले तो ठीक नहीं तो एक जोड़ा खूबसूरत आंखें भी तो लकीरों में धरा कर लायी है ।खोल देती है नल और दुख भी कितना तरल .....बांवरा बह जाता है रेशा रेशा



तुम बस तसल्ली रख दिया करो मुझपर
बाक़ी इश्क़ तो मेरा अपना बहुत है....
मर जाने के लिए
हृदय की नाल कलम ने जब भी काटी कागज़ पर मृत कविता ने जन्म लिया।
कोष भरा ...काश शेष रहा
जो खूबसूरत है उसे लिखा जाना जरूरी
जो नहीं है उसे बनाया जाना उससे भी जरूरी
ज़िन्दगी समझती है ....इसलिए तुम्हें छूती है
रोज़ की दस्तक ...
हथेलियों में शब्द
होठों पर मुस्कान
लो कल्पना ! तुम्हें हुस्न मुबारक....
हुनर मुबारक !

वही ज़िन्दगी अगर दूसरी बार चखनी हो तो उसे इस बार लिख कर देखिए।
तुम्हारे जादू में विश्वास है इसीलिए तुम्हें तलाशते हैं....




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