सोमवार, 4 जून 2018

बंद चौखटें .....आसमान को खुलती हुई

बिलकुल एक जैसे रंग का दिन ओढ़ के हम दोनों दाखिल हुई उस चौखट में जिसने हम दोनों की अलग अलग ज़िन्दगियों पर एक जैसा..... हूबहू इक जैसा ठप्पा मार दिया था....तलाक़ ।
हम दो औरतें थी एक जैसी ।उस दिन तो उदासी का रंग भी एक जैसा ही था हमारे चेहरे पर ।पर जाने क्यों मैं शान्त थी और वो बेहद रुआंसा ।मैं अपनी रही सही बेलें काट कर स्वछंद होना चाह रही थी और वो अब भी उन बेलों में सूखे फ़ूल ढूंढ रही थी।अपने दो बच्चों का हाथ बेहद कसकर पकडे हुई उसकी ममता शायद बेहद टूटा हुआ महसूस कर रही थी।और शायद अकेला भी ।कोई न था उसके पास उन दो सहमे फूलों के अलावा। और एक मैं थी..... जिसके साथ माँ ,पिताजी और भाई सभी थे ।

सोच रही थी जब तारीख़ और तलाक़ भगवान् ने हम दोनों को एक ही जैसा दिया तो तक़दीर भी एक जैसी दे देता।
फिर सोचा सब वो ही देगा तो इंसान क्या ख़ाक करेगा ? रिश्ते तोड़ने के लिए भी इंतज़ार करना होता है .....ये उस दिन कोर्ट में पता चला। बस उसी इंतज़ार वाला वक़्त उन बच्चों के साथ दोस्ती में लिपट गया । मैं क्या करुँगी आगे.... ये तो सब तय था, पर इन तीनों का रास्ता कहाँ जायेगा ...... क्या होगा इनका? बस यही सोचते हुए पता नहीं कब दिन सरक गया। हमारे बीच आज से पहले कुछ common नहीं था पर शायद तारीख़ और वजह का एक जैसा हो जाना हमें करीब ले आया ... बेहद करीब।

कुछ रस्में ...खासकर शादी की शुरुवात में बेहद मायने रखती हैं और रिश्ता ख़त्म होते होते फ़िज़ूल हो जाती हैं।सो उन फ़िज़ूल सी रस्मों का कागज़ पर हिसाब करते हुए जब मैं लौटी तो अब मेरे पास एक बहुत बड़ी रकम थी जिसे alimony of the last ceremony कहना ठीक होगा और साथ में थी तीन और ज़िन्दगियाँ जो मेरे साथ कार की पिछली सीट में बैठ कर शायद ये सोच रही थी कि ये जादूगरनी हमें कहाँ उड़ा ले जा रही है।शायद उनके कौतूहल में मुझे मेरी जीत साफ़ नज़र आ रही थी । वो खुशनसीब थे और मैं बेहद खुश।

"गम का खज़ाना तेरा भी है मेरा भी" ... fm पर जगजीत जी की ग़ज़ल full volume पर बज रही थी और पर मैं हंस रही थी ।

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हमेशा....

तुमने हर बार मुझे कम दिया और मैंने हर बार उससे भी कम तुमसे लिया। ना तुम कभी ख़ाली हुए .... ना मैं कभी पूरी हुई। हम यूँ ही बने रहें....हमेश...