शनिवार, 5 मई 2018

आदत

कितने ही मोड़ 
कितने ही चौराहे 
कितने ही घर 
कितने ही चौबारे पार करके रोज़ अपने उस रुके हुए शहर तक पहुंचना अजूबा नहीं आदत है। ये आदतें हमें मुसाफ़िर बनाये रखती हैं। पत्थर होकर भी पिघलाएं रखती हैं। एक अनंत बनाये रखती हैं।
जब तक तुम्हारा शहर निश्चिन्त है, मैं खूबसूरत रूमानी सफर में रहूंगी।

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