गुरुवार, 3 मई 2018

विदा दो।


पहाड़ छोड़ो तो लगता है अंतस से एक बड़ा सा पत्थर लुढ़का दिया हो जैसे । तीन घंटे का सफर है इस पत्थर का। इन तीन घंटों में जाने जाने क्या पीछे छोड़ देती हूँ ।
इसे आगे बढ़ना तो कत्तई नहीं कह सकती क्योंकि हर पल एक टीस होती है। शायद बड़ा पत्थर टूट टूट कर धंसता जाता होगा ।छोटी बड़ी बहुत सारी ग्लानियाँ महसूसता है दिल। हाँ और ना के बीच का द्वंद काटे नहीं कटता।
पहाड़ी अपने सच्चे दुख घर के देली में रख आते हैं और झूठे सुख का पीठिया लगा कर पहाड़ छोड़ देते हैं।
ये पहाड़ भी ना.... कितना वफादार दिलबर है ।
रुके रहता है .....
और मैं कितनी जरूरतमंद ....
सच..... छोड़ कर जाना एक बेहद बेहिस प्रक्रिया है।
मेरा पत्थर दरक गया । तुमको मेरी उम्र लगी रहे दिलबर।
लौटती हूँ फिर .... बाहों में जगह बचाये रखना। हमेशा कहती हूँ .. लो फिर कह रही ... तुम मुझे इस लिए भी पसंद हो कि बाहें फैलाये मेरा इंतज़ार करते हो।
विदा दो।

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