गुरुवार, 3 मई 2018

"जीवित दस्तावेज़ "

हम होते तो रोज़ाना ही हैं पर अपनी आमद दर्ज करना भूल जाते हैं। अक्सर वो दिन याद रहता है जब किसी एक पल को कई सौ बार सोचने के लिए मन उछले। ट्रैक से हट कर किसी रोज़ वाले दिन का एक कोना फाड़ लेना और उसीका छोटा सा हवाई जहाज़ या नाव बना लेना ।उस पर सवार होकर कई टेढ़े सीधे पुल पार करना और मिलना उस एक वजह से जो आपके होंठों पर मुस्कान और धड़कनों पर तूफान सील दे। ये ठीक वैसा ही जैसे सात रंगों के धनुक को चटख धूप में पा लेना वो भी unplanned ....पूरा का पूरा।
उस रोज़ एक बंजारे से मुलाक़ात हुई ।जाना कि आसमान में खिड़कियां बनाना उतना ही जरूरी है जितना साँस लेना। लिखने से बेहतर होता है सुनना । हर उस जीव निर्जीव को सुनना जो आंखों के दायरे में पड़ता हो। सुनना इतनी कठिन प्रक्रिया है उससे मिलने के बाद जाना। रेशम लिखना हो तो रस्सियों को उँगली पर लपेटो और धूप लिखनी हो तो छांव को रेशा रेशा अलग कर तह तक पहुंचो।
अपनी हर बात पर अपनी एक कहानी मेरी हथेली में रख देना उस बंजारे का सबसे अनमोल तोहफ़ा रहा । उसके किरदार उस रोज जैसे मेरे गहने बन गए ।क्या रंगत ....क्या कशिश ... कैसे लिखूं ?
सादगी को कितना भी निचोड़ो या कितना भी कुरेदो वो अपना ज़ायका नहीं छोड़ती। सादे बंजारे के साथ चाय की चुस्की में उसी ज़ायके को पिया और इस बार की कहानी ने मेरे आंखों से कुछ बूंदें इत्र की लुढ़का दी ।इस बार उसकी प्रेमिका के लिए ।
महसूसने के लिए स्पर्श नहीं किसी का ज़ायका भी हो सकता है या किसी अनजान की महक भी हो सकती है ....ये उस रोज जाना। उस रोज बहुत मन था कि समय को अपने दुपट्टे में बांध लूं ... कुछ देर ही सही ।
मन था कि ठीक उसी पल का कोना फाड़ लूँ और उड़ जाऊं ।पर मेरा दुपट्टा भी मुआ रेशमी निकला ।फिसल गया .... रोज़ की तरह।
बंजारा मेरा चेहरा सुन रहा था ... जिसमें वो माहिर था।
चहकते हुए बंजारे ने कहा कि जिस किसी रोज़ चाहना पहन कर उड़ने का मन हो तो आकाश और समंदर न खोजा करो कल्पना .... पहाड़ पर उगे जंगलों का रूख कर लिया करो। अजीब सुकून है। पर कुछ देर ही उड़ना फिर उतर आना ।
उतर कर लिखना ....हमेशा
हर बार
हर किसी को ....ठीक उसी जैसा ....जैसा तुम उसे सुन कर आई हो
हर उस बात को ......वो जो तुम कह कर नहीं ....बस सुन कर आई हो
आंख खोल कर सुनना सीखो कल्पना और फिर कान बंद कर लिखना ।
अपनी आमद दर्ज करना कभी न भूलना। कागज़ पर कविता हो जरूरी नहीं ।कोई कोई उड़ान तुम आंखों में लिख कर अपनी ही आंखों से खुद को निहार लिया करो ।सांझी कविता जरूरी नहीं कि हर किसी से सांझा ही हो।
उस रोज कितना कुछ संजोया ये तुमको क्या बताना बंजारे।
बंजारे के शब्दकोश में मोह नहीं होता ।ये मैं उसकी कहानी में सुन चुकी थी ।
बंजारे तुम गूंजते रहो। मैं सुन रही ....
और हां तुम्हारे दो शब्द मुझे ख़ास पसंद आये ...उस रोज़
"जीवित दस्तावेज़ "
हमेशा याद रखूंगी।

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प्रेम सबसे कम समय में तय की हुई सबसे लंबी दूरी है... यात्रा भी मैं ... यात्री भी मैं