शनिवार, 5 मई 2018

भ्रम


कभी सांस थे ......आज सिर्फ भ्रम
तुम रुक रुक कर .......इतना क्यों रुक गए ?

आदत

कितने ही मोड़ 
कितने ही चौराहे 
कितने ही घर 
कितने ही चौबारे पार करके रोज़ अपने उस रुके हुए शहर तक पहुंचना अजूबा नहीं आदत है। ये आदतें हमें मुसाफ़िर बनाये रखती हैं। पत्थर होकर भी पिघलाएं रखती हैं। एक अनंत बनाये रखती हैं।
जब तक तुम्हारा शहर निश्चिन्त है, मैं खूबसूरत रूमानी सफर में रहूंगी।

सिर्फ़ प्रेम



फ़िर एक रोज़ हम थक जाते हैं प्रेम को पुकारते नकारते हुए ....
और चलना शुरू कर देते हैं
कई दफ़ा आगे
अमूमन पीछे ही
पत्थर और पहाड़ सिर्फ़ प्रेम में ही डूबते उबरते हैं ...
चल चल कर

श्वेत श्याम

उदासियाँ अगर मुस्कुराने का हुनर रखती तो हरगिज़ श्वेत श्याम ना होती।

इत्र

सुनो! 
तुम इस लिए भी कायम हो मुझमें अब तलक कि मुझमें सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारा ही ज़िक्र बिखरा हुआ है ।
कुछ इत्र सूखते नहीं ....राब्ता हो जाते हैं।

नए दुख



हम अपने पुराने दुख ,अवसाद और उदासियों को recycle करना सीख गए हैं।इसलिए नए दुख इज़ाद नहीं कर पाते।
ठीक से जी नहीं पाते नए प्रेम

"हाँ"

तुम्हारे सवाल इन आँखों मे रोक रखें हैं...
कहो तो "हाँ" कह दूं?


गुरुवार, 3 मई 2018

विदा दो।


पहाड़ छोड़ो तो लगता है अंतस से एक बड़ा सा पत्थर लुढ़का दिया हो जैसे । तीन घंटे का सफर है इस पत्थर का। इन तीन घंटों में जाने जाने क्या पीछे छोड़ देती हूँ ।
इसे आगे बढ़ना तो कत्तई नहीं कह सकती क्योंकि हर पल एक टीस होती है। शायद बड़ा पत्थर टूट टूट कर धंसता जाता होगा ।छोटी बड़ी बहुत सारी ग्लानियाँ महसूसता है दिल। हाँ और ना के बीच का द्वंद काटे नहीं कटता।
पहाड़ी अपने सच्चे दुख घर के देली में रख आते हैं और झूठे सुख का पीठिया लगा कर पहाड़ छोड़ देते हैं।
ये पहाड़ भी ना.... कितना वफादार दिलबर है ।
रुके रहता है .....
और मैं कितनी जरूरतमंद ....
सच..... छोड़ कर जाना एक बेहद बेहिस प्रक्रिया है।
मेरा पत्थर दरक गया । तुमको मेरी उम्र लगी रहे दिलबर।
लौटती हूँ फिर .... बाहों में जगह बचाये रखना। हमेशा कहती हूँ .. लो फिर कह रही ... तुम मुझे इस लिए भी पसंद हो कि बाहें फैलाये मेरा इंतज़ार करते हो।
विदा दो।

"जीवित दस्तावेज़ "

हम होते तो रोज़ाना ही हैं पर अपनी आमद दर्ज करना भूल जाते हैं। अक्सर वो दिन याद रहता है जब किसी एक पल को कई सौ बार सोचने के लिए मन उछले। ट्रैक से हट कर किसी रोज़ वाले दिन का एक कोना फाड़ लेना और उसीका छोटा सा हवाई जहाज़ या नाव बना लेना ।उस पर सवार होकर कई टेढ़े सीधे पुल पार करना और मिलना उस एक वजह से जो आपके होंठों पर मुस्कान और धड़कनों पर तूफान सील दे। ये ठीक वैसा ही जैसे सात रंगों के धनुक को चटख धूप में पा लेना वो भी unplanned ....पूरा का पूरा।
उस रोज़ एक बंजारे से मुलाक़ात हुई ।जाना कि आसमान में खिड़कियां बनाना उतना ही जरूरी है जितना साँस लेना। लिखने से बेहतर होता है सुनना । हर उस जीव निर्जीव को सुनना जो आंखों के दायरे में पड़ता हो। सुनना इतनी कठिन प्रक्रिया है उससे मिलने के बाद जाना। रेशम लिखना हो तो रस्सियों को उँगली पर लपेटो और धूप लिखनी हो तो छांव को रेशा रेशा अलग कर तह तक पहुंचो।
अपनी हर बात पर अपनी एक कहानी मेरी हथेली में रख देना उस बंजारे का सबसे अनमोल तोहफ़ा रहा । उसके किरदार उस रोज जैसे मेरे गहने बन गए ।क्या रंगत ....क्या कशिश ... कैसे लिखूं ?
सादगी को कितना भी निचोड़ो या कितना भी कुरेदो वो अपना ज़ायका नहीं छोड़ती। सादे बंजारे के साथ चाय की चुस्की में उसी ज़ायके को पिया और इस बार की कहानी ने मेरे आंखों से कुछ बूंदें इत्र की लुढ़का दी ।इस बार उसकी प्रेमिका के लिए ।
महसूसने के लिए स्पर्श नहीं किसी का ज़ायका भी हो सकता है या किसी अनजान की महक भी हो सकती है ....ये उस रोज जाना। उस रोज बहुत मन था कि समय को अपने दुपट्टे में बांध लूं ... कुछ देर ही सही ।
मन था कि ठीक उसी पल का कोना फाड़ लूँ और उड़ जाऊं ।पर मेरा दुपट्टा भी मुआ रेशमी निकला ।फिसल गया .... रोज़ की तरह।
बंजारा मेरा चेहरा सुन रहा था ... जिसमें वो माहिर था।
चहकते हुए बंजारे ने कहा कि जिस किसी रोज़ चाहना पहन कर उड़ने का मन हो तो आकाश और समंदर न खोजा करो कल्पना .... पहाड़ पर उगे जंगलों का रूख कर लिया करो। अजीब सुकून है। पर कुछ देर ही उड़ना फिर उतर आना ।
उतर कर लिखना ....हमेशा
हर बार
हर किसी को ....ठीक उसी जैसा ....जैसा तुम उसे सुन कर आई हो
हर उस बात को ......वो जो तुम कह कर नहीं ....बस सुन कर आई हो
आंख खोल कर सुनना सीखो कल्पना और फिर कान बंद कर लिखना ।
अपनी आमद दर्ज करना कभी न भूलना। कागज़ पर कविता हो जरूरी नहीं ।कोई कोई उड़ान तुम आंखों में लिख कर अपनी ही आंखों से खुद को निहार लिया करो ।सांझी कविता जरूरी नहीं कि हर किसी से सांझा ही हो।
उस रोज कितना कुछ संजोया ये तुमको क्या बताना बंजारे।
बंजारे के शब्दकोश में मोह नहीं होता ।ये मैं उसकी कहानी में सुन चुकी थी ।
बंजारे तुम गूंजते रहो। मैं सुन रही ....
और हां तुम्हारे दो शब्द मुझे ख़ास पसंद आये ...उस रोज़
"जीवित दस्तावेज़ "
हमेशा याद रखूंगी।

लिपि

दुःख .... छोटी लिपि का अत्यंत बड़ा शब्द