शनिवार, 21 अप्रैल 2018

खिड़कियां



जाने क्यों ...?
मुझे हमेशा से दरवाजों से कम खिड़कियों से ज्यादा प्रेम रहा है।
दरवाज़े आज़ाद नहीं करते....
खिड़कियां शायद मुक्त कर देती हैं।
मैं प्रेम को स्थगित करना कभी नहीं सीखूंगी... खासकर अपने आप से।
रोज़ नई खिड़कियां .... अक्षर वाली ही सही गोद लूंगी खुद पर .....
दरवाजे खुले न खुले ।

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