रविवार, 15 अप्रैल 2018

मकबूल....




एक रोज़ उंगलियों के पोरों से खुरचे रंगों ने पूछा ...
हुसैन क्या तलाशते हो खाली कैनवास पर ?
क्या नहीं मिलता?
 और ....क्या रह जाता है हर बार 
माँ ढूंढता हूँ और वो हर बार औरत हो जाती है 
शायद मैं मकबूल होना चाहता हूँ
पर देखो ना हर बार फिदा हुआ जाता हूँ।
खुरचे रंग शरमाये...
 उड़े और...
हुसैन की दाढ़ी में छिप गए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

बिम्ब

एक शब्द लिखकर सैंकड़ों बिम्ब देखोगे? लिखो.... "प्रेम" मैं चुप थी पर चुप्पी कभी नहीं थी मेरे पास अब बस चुटकी सा दिन बचा है । अप...