शनिवार, 14 अप्रैल 2018

अजनबी कौन हो तुम .....



सुबह चार बजे अचानक आंख खुली तो देखा कोई खिड़की से झांक रहा था। वो मुस्कुराया तो अलसायी आंखों से ही सही हँसी वापस करना लाज़मी था।
उसकी तरफ करवट लेकर पूछा ...क्या टुकुर टुकुर देख रहे हो ? कुछ चाहिए क्या ?
बेहद रूमानी चेहरा बना कर बोला "चाँद"......
रुकी हुई कल्पना पढ़ रहा था। तुमने पन्ना मोड़ दिया।
पास पड़ा फ़ोन उठाकर कैद किया अजनबी और चूम कर कहा ....चल झूठा ! हर खिड़की , हर छज्जे पर यही कह कर आया होगा।
phone पर कुछ स्क्रॉल किया ...
"अजनबी कौन हो तुम.... जब से तुम्हें देखा है" select कर जाने कब फिर सो गई।
आज यही गीत सुनती रहूंगी अजनबी .... तुम्हारे लिए।

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तुमने हर बार मुझे कम दिया और मैंने हर बार उससे भी कम तुमसे लिया। ना तुम कभी ख़ाली हुए .... ना मैं कभी पूरी हुई। हम यूँ ही बने रहें....हमेश...