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रविवार, 15 अप्रैल 2018

दावानल ...




अपनी रत्ती भर राख 
आज आखिरकार उसने कागज़ पर धर ही दी 
इक लौ जंगलों तक पैदल पैदल पहुंची
फिर दावानल रच दिया 
 शहर 
 आसमान 
दरिया सब सेंक कर रख दिया

 वो आज भभकी नहीं .....सूखी घास सी
लौ में कुंदन सी दूर तक आंच ले गई आंचल में
सुन्दर ....सुर्ख़ ....शब्दों में बेबाक हो गई
लोग आहत  
बेहद आहत 
 कुछ मूक विस्मित भी

तुम आज कागज़ पर शब्दों सी प्रखर हो
रूमानी अग्नि सी ..... बेहद ठोस
स्त्री तुम लिखने लगीं
तभी चुभने भी लगीं
यलगार हो......


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