रविवार, 15 अप्रैल 2018

तुम्हारे मेरे दरमियां

अरे मुस्कुराई कहाँ?
बस ........एक मुट्ठी धूप वार दी


सफ़ेद पन्नों को पढ़ने के लिए ख़ाली चाहनाओं को लिखना आना चाहिए।

कब तक फिसलते रहोगे .....इस शाम की तरह
कब तक चलते रहोगे ..........इस चाँद की तरह
लाओ........अपने शब्दों का लंगर डाल देती हूँ
तुम्हें .........डायरी में रोक देती हूँ l

इस फ़ेर मिलो तो शब्दों का सायबान मेरे नाम रख जाना।
इन आँखों को इंतज़ार रहेगा.......


मुद्दत हो गई.....
मेरे शहर ने तुम जैसी आंखें नहीं देखी।

तुम्हारे मेरे दरमियां कुछ बातें कितनी बातें हैं ....
और कुछ बातें कितने शब्द

किसी रोज़ मेरे शब्दों की छांव तले रुक कर देखना ....
हर अक्षर तुमसा नज़र आएगा ...और तुम्ही से कहता नज़र आएगा...
साथिया....



एक हद के बाद हम अपनी सहूलियत के लिए दुख से भी सुख सोखने लगते हैं।
ज़िन्दगी मांगती कब है .....बस चाहती जाती


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तुमने हर बार मुझे कम दिया और मैंने हर बार उससे भी कम तुमसे लिया। ना तुम कभी ख़ाली हुए .... ना मैं कभी पूरी हुई। हम यूँ ही बने रहें....हमेश...