शनिवार, 21 अप्रैल 2018

प्रेम

नज़दीकियों और दूरियों के दरमियाँ 
"जगह" का कोई किरदार नहीं होता 
बस ....इक "वजह" होती है 
जो बेबाक बोलती हुई 
प्रेम को
स्थापित....... विस्थापित .... पुनर्स्थापित
करती रहती है 

जुगनू

ओह !
अब ये जाना ....कि मेरा लिखा
हर शब्द
तुम्हें जुगनू क्यों लगता है .....
प्रेम में हूँ ना ......मैं 
और तुम भी.... कदाचित
ये मैं नहीं ....
अमृता जी कहती हैं.....
"मुहब्बत का एक लफ्ज
जब किसी की आत्मा में
चिराग की तरह जलता है
तो फिर जितने भी अक्षर
उसके होंठों पर आते हैं
वे रोशनी बाँटते हैं
थैंक्स अमृता जी ....
लेखनी के जुगनू मुबारक..... मुझे

आस्था

विश्वास में आस्था फिर भी कम हो सकती है 
पर आस्था में विश्वास जरा भी कम नहीं हो सकता।

मायने

उनके लिए क्या गिर जाना जो सँभालने के मायने न जानते हों

दरिया

एक दरिया रखना है कागज़ पर तुमसे भरा हुआ ....
बोलो रुकोगे मेरे शब्दों में।

ज़िन्दगी फ़िदा है

रात की सुइयों को टिक- टिक करते हुए विदा देना और रोज़ नई सुबह कलाई में बांध लेना।
ज़िन्दगी फ़िदा है ...मुझपर

खिड़कियां



जाने क्यों ...?
मुझे हमेशा से दरवाजों से कम खिड़कियों से ज्यादा प्रेम रहा है।
दरवाज़े आज़ाद नहीं करते....
खिड़कियां शायद मुक्त कर देती हैं।
मैं प्रेम को स्थगित करना कभी नहीं सीखूंगी... खासकर अपने आप से।
रोज़ नई खिड़कियां .... अक्षर वाली ही सही गोद लूंगी खुद पर .....
दरवाजे खुले न खुले ।

झूठ

खुद से सच्चा होने के लिए हमें बहुत सारे झूठ पार करने पड़ते हैं।
हमें तैरना आता है .... तर ना नहीं।

ऐसे ही उदास हूँ ....


कि अब अगर मैं कुछ भी न कहूँ तो तुम इसे मेरे इंतज़ार में गिनोगे या नाराज़गी में?
जा नहीं रही बस .....ऐसे ही उदास हूँ ।

संवेदना पहुंचे .



इतना चीख लेने के बाद भी
हम अपनी ही आवाज़ नहीं बन पा रहे ....
शायद
दुख और अवसाद ही बचे....
एक दूजे के आंसू पोंछने और
फिर एक नया ज़ख्म बोने- कुरेदने को।
हम तो हो चुके .....
जितना हो सकते थे
निष्प्राण
निष्क्रिय....
न्यून.....
हमारे जैसे एक साँस लेते "निर्वात" को संवेदना पहुंचे ....
पर किसकी ?

नज़्म

रखी तो मैंने बेचैनियां थी कागज़ पर ....
ये बात और है .....कि एक नज़्म निकली

इंतज़ार

हर कोई किसी न किसी इंतज़ार में बना हुआ है।
और इंतज़ार गिने नहीं जाते

करीब करीब अजनबी



करीब करीब अजनबी हो जाने के लिए शुक्रिया।
कुछ नहीं हो जाने से बेहतर है तुम्हारे नाम का ये एक दुख चुन लेना।
मुश्किल ये है कि "इंतज़ार" शब्द में दो चार अक्षर और जोड़ कर उसे बढ़ाया नहीं जा सकता । वो खत्म होने को है।
मेरी बात अलग है... मैं कल्पना हूँ। तुम्हारे लिए असीम

दस्तख़त

सारा का सारा तुम ही तो हो.....
मैं तो बस दस्तख़त भर हूँ

स्पर्श .....


स्पर्श .....
एक सुकून कि तुम मेरी परिधि के भीतर हो...
सिर्फ़ मेरे लिए।

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

जादू

हम रास्ता उम्मीद में अक्सर कम ....ज़िद्द में कहीं ज्यादा नाप देते हैं ।


मैं फिर कहती हूँ तुम्हारे पास एक नीला दिल है जो सिर्फ़ मेरे लिए ही काला है ।
थोड़ा अजीब है ....पर यही तो जादू है।

किसी रोज़ गर चाँद मुझसे पूछे ईदी क्या लोगी कल्पना?
ढेर सारे मेरे हिस्से वाले लाल गुब्बारे और बस एक स्माइली तुम्हारी वाली
कोई लाके मुझे दे

हम कई बार प्रेम में मृत हो जाते हैं .....पर मृतक नहीं हो पाते


आपको याद करना क्या मुश्किल है ?
नीला आसमान ही तो तकना है
बिना चाँद वाली चाहना है
फिर भी मुस्कुराती मिलूँगी
हमेशा ..............

स्पर्श .....

स्पर्श .....
एक सुकून कि तुम मेरी परिधि के भीतर हो...सिर्फ़ मेरे लिए।

रविवार, 15 अप्रैल 2018

उ .... दास था।

घोर उदासियों के इस दौर में
हमें उससे भी घोर उदासियाँ
देखने और सुनने की आदत होने लगी है
ये रुका नहीं तो
हमें उदास आंखें इज़ाद करनी होंगी
और पारा पड़े कान भी
इससे भी उदास मंज़र लिखने पड़ेंगे
जाने कितने ?
जाने क्यूँ ?
क्या हम तैयार हैं ?
और हमारी कलम?

घोर उदासियाँ हमें खुरच रहीं हैं।
रोज़ रोज़
धीरे धीरे
एक दिन हम बचेंगे ही नहीं
उदास गर्द बचेगी...
इंसान नाम की
ग्लानि में लिपटी
अनपढ़
जाहिल
असंवेदनशील
अमानुष

फिर जाने कौन कहेगा......
उ .... दास था।

हसरत

"हसरत" लिखने के लिए ....

सिर्फ चार अक्षर और बहुत सारा तुम चाहिए।

लिख लूँ ना?

इक कविता

इक कविता
धुंधले शब्दों वाली
कभी मुझे ....
कभी तुम्हें टोहती
ना थकने वाली
परत दर परत
यादों का शेल्फ़ लिखती
किताब की शक्ल लेती
इसे रिहाई मिलने तक
रुके रहोगे ना तुम
कलम की नोंक पर

भाषा

मन जब टूटता है तो कलम बीचोंबीच से चिर जाती है।
उदास कागज़ से शब्द रूठ जाते हैं।
मौन की अपनी भाषा फिर शुरू होती है।

प्रेम

"पहले तुम" कह कर देखिये ....
सारी प्रेम कविताएं धरी की धरी रह जानी है।


फिर एक रोज़ उसकी उदासी जम जम कर काई हो गयी। इतनी ठोस कि वो उस पर पैर रख कर दूर चला गया।
उसके पैरों के निशान जब लोगों ने छू कर देखे तो उनमें कहानियां लबालब भरी हुई थी।
हर उदास कहानी सब की ज़िन्दगियों के ठीक बीचों बीच से गुजरती हुई। पुल ,नदी ,शहर ,खेत ,पहाड़ ,बालू पार कर ये लोग उस तक पहुंच ही गए .....
सिर्फ ये कहने कि ....हमें तुमसे प्यार है।
लिखो हमारे लिए कि..... उदासियाँ हमें पसंद हैं ।
रूमान के ठीक बाद वाला पायदान सिर्फ तुम बेहतरीन लिखते हो ....जादूगर

छू कर देखो ...
प्रेम दो बुलबुलों से बना एक प्यारा भरम है।
एक मैं....
एक तुम ...

प्रेम वाली तितलियों की खूब सुन ली.....
अब बस इश्क़ वाले जुगनुओं से गुफ़्तगू होगी...
चले आओ बेधड़क........
ज़िन्दगी आज मज़े में है।

सुनो चाँद !
आज चुप्पियों में शोर घोलकर पीते हैं ।
अपना coffee mug ले आओ।
आज कुछ असमानी करते हैं ।

गुलाब

 · 
वो इस लिए भी दिलकश बना रहता है क्योंकि ना कहना जानता है।
कांटे पहन लेना इतना भी आसान नहीं ......वो भी सादा सा गुलाब होकर। हूबहू तुम्हारी महक वाला।
तुम्हारी चाहना दबाना मुश्किल नहीं पर तुम्हारी महक ....
बस वही आसानी से छूटती नहीं।
पंखुड़ी पंखुड़ी महक सहेजना अब जरूरत है.... आदत तो तुम्हारी "ना types" वाली ही है ।

कागज़ का शोर कल्पना का मौन है

किसी रोज़ बिखेरने लगो तो बताना...
मैं तुम्हारे लिए कविता हो जाऊंगी ।
बस अभी.... शब्दों को आगोश में लेकर कल्पना को कहते देखा

सुनो ना...
मेरी सारी कविताएँ पोंछ दो...
आज खोने का जी है....
एक बार फिर कल्पना होने का जी है।

आंखे उन सवालों के जवाब कभी नहीं देती जो उससे पूछे जाते हैं....
हाँ ......उन सवालों का जवाब जरूर होती हैं जो उसमें घुल जाते हैं।

हाँ बोलकर मुकर जाना ....
ज़िन्दगी की इसी अदा से इश्क़ रखती हूं।

परे जाकर अपना बस संजोना ......
प्रेम ये भी तो है।

लो...... चाँद भी बुझा दिया
अपने शब्दों की लौ भी कम कर दी
मुस्कुरा देते तो.... रात रानी खिल जाती

कागज़ का शोर कल्पना का मौन है

साथी बदलते हैं.... साया नहीं बदलता
ज़िन्दगी को किसी भी कोने से छू लो..



जितनी देर साथ दे सके .... साये में रहे...

इश्क़ जब जब भी तेरे लिए शाद रहा
जाने कितने ही दिलों का फ़साद रहा।

हम दोनों के बीच एक तय दूरी हमेशा चलती है जिसमें हम दोनों कम ज्यादा होते रहते हैं ।
वो ज्यादा पास आते नहीं...... हम ज्यादा दूर जाते नहीं।

निगोड़े "बादल''

तुम भी न ...
हूबहू
उस "बादल" की तरह हो
जो अनकहा प्रेम
बूंदों में भरा बैठा है मेरे लिए.....
ऐसे की बस
"कल्पना कल्पना" वाली
टिप टिप पिरो रहा हो
ऐसे की बस
ये रूमानी मंजर
सिर्फ मेरे लिये गढ़ रहा हो
पर
बादल तो .....बादल है न
तुम्हारी तरह ही "पुरुष"
देखो ......
उड़ गया न पल में
सारा स्नेह लेकर
सारी भावना समेटकर
वो देखो ....
हूबहू तुम्हारी तरह
इक टुकड़ा बादल
फिर
हंस रहा है मुझ पर
मेरी कोफ़्त पर
काश तुम मेरी तरह होते ....
बहते जाते
और
कहते जाते
बस ये निगोड़े "बादल" न होते
उड़ने वाले ....
ना कहने वाले

छोर .

छोर ... इस शब्द को
"छू" लूँ ......तो कितना कुछ....
और "छूट" जाए तो कुछ भी नहीं......

कभी सोचती हूँ ...
एक अक्षर का जुड़ना और न जुड़ना भी कितना वजूद रखता है ।
है ना?

खुशी


मुझसे बेहतर मुझे कोई खुश नहीं रख सकता ....
यह जानते हुए भी रोज़ मुझे कुछ औऱ हो जाना पसंद है 
वैसे पसंद शब्द सटीक बैठ नहीं रहा पर जाने दो......
एक दिन में सैंकड़ों पल 
उन सैंकड़ों पलों के लिए कुछ हज़ार चाहनाएँ 
‎उन हज़ार चाहनाओं के लिए कुछ सौ चेहरे
‎उन सौ चेहरों में से सिर्फ एक अपने वाला मन ढूंढना 
रोज़ यही करना....
बस यही करते जाना .........
और बस उसी मन पर आकर रुक जाना 
मुझसे बेहतर मुझे कोई खुश नहीं रख सकता ....
सच....
रोज़ मुझे कुछ औऱ हो जाना पसंद है 
कभी पल 
कभी चाहना
कभी चेहरा 
कभी मन
खुशी .......दो शब्दों से नहीं कल्पना भर से भी बनती है।

तुम्हारे मेरे दरमियां

अरे मुस्कुराई कहाँ?
बस ........एक मुट्ठी धूप वार दी


सफ़ेद पन्नों को पढ़ने के लिए ख़ाली चाहनाओं को लिखना आना चाहिए।

कब तक फिसलते रहोगे .....इस शाम की तरह
कब तक चलते रहोगे ..........इस चाँद की तरह
लाओ........अपने शब्दों का लंगर डाल देती हूँ
तुम्हें .........डायरी में रोक देती हूँ l

इस फ़ेर मिलो तो शब्दों का सायबान मेरे नाम रख जाना।
इन आँखों को इंतज़ार रहेगा.......


मुद्दत हो गई.....
मेरे शहर ने तुम जैसी आंखें नहीं देखी।

तुम्हारे मेरे दरमियां कुछ बातें कितनी बातें हैं ....
और कुछ बातें कितने शब्द

किसी रोज़ मेरे शब्दों की छांव तले रुक कर देखना ....
हर अक्षर तुमसा नज़र आएगा ...और तुम्ही से कहता नज़र आएगा...
साथिया....



एक हद के बाद हम अपनी सहूलियत के लिए दुख से भी सुख सोखने लगते हैं।
ज़िन्दगी मांगती कब है .....बस चाहती जाती


सुन सकोगे मुझे ?



मुझे?
मुझे सुनना चाहोगे ?
ख्वाइश...... अद्भुत है तुम्हारी 
  सोच लो .....
  मैं एक ऐसी कहानी हूँ...
 जो अक्षर से शुरू होकर
  शब्दों में घुलती हुई 
  वाक्यों में समां जाती  है 
  फिर अनुछेद दर अनुछेद
    बहती चली जाती है 
    उलझन ये नहीं ......
   उलझन ये है ..कि 
   हर अल्पविराम 
   और
   पूर्णविराम से
  मेरी इक नयी कहानी शुरू हो जाती है 
  और ये सिलसिला सतत है .....
   इक कहानी में
    सैंकड़ों कहानियाँ कह देने का हुनर हूँ मैं .... 
    
    बोलो.... सुन सकोगे मुझे ?
    हर अल्पविराम के बाद
     हर पूर्णविराम के बाद 
     नए सिरे से 
     हर बार 
     बार बार 
     सिर्फ मुझे 

मकबूल....




एक रोज़ उंगलियों के पोरों से खुरचे रंगों ने पूछा ...
हुसैन क्या तलाशते हो खाली कैनवास पर ?
क्या नहीं मिलता?
 और ....क्या रह जाता है हर बार 
माँ ढूंढता हूँ और वो हर बार औरत हो जाती है 
शायद मैं मकबूल होना चाहता हूँ
पर देखो ना हर बार फिदा हुआ जाता हूँ।
खुरचे रंग शरमाये...
 उड़े और...
हुसैन की दाढ़ी में छिप गए।

बाँसुरी....

दिल के तीन खानों में उसकी प्रेमिकाएं जीवंत रहती और चौथे खाने में वो अपने परिवार के साथ खुशी खुशी रहता था। बचपन में एक pied piper की कहानी...