मंगलवार, 18 जुलाई 2017

बादल

तुम भी न ...
हूबहू
उस "बादल" की तरह हो
जो अनकहा प्रेम
बूंदों में भरा बैठा है मेरे लिए.....
ऐसे की बस
"कल्पना कल्पना" वाली
टिप टिप पिरो रहा हो
ऐसे की बस
ये रूमानी मंजर
सिर्फ मेरे लिये गढ़ रहा हो

पर
बादल तो .....बादल है न
तुम्हारी तरह ही "पुरुष"
देखो ......
उड़ गया न पल में
सारा स्नेह लेकर
सारी भावना समेटकर

  वो देखो ....
हूबहू तुम्हारी तरह
इक टुकड़ा बादल
फिर
हंस रहा है मुझ पर
मेरी कोफ़्त पर

काश तुम मेरी तरह होते ....
बहते जाते
और
कहते जाते
बस ये निगोड़े "बादल" न होते
उड़ने वाले ....
ना कहने वाले

कल्पना पांडेय

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