Follow by Email

बुधवार, 30 नवंबर 2016

रात

रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद 
और ....
उसी चाँद को निगलकर मैं .....रात हो जाती हूँ

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें