बुधवार, 30 नवंबर 2016

हिमाकत

मुझसे इश्क़ की हिमाकत ना कीजिये
मैं शब्द हूँ..... तुम्हें छिपा नहीं पाऊँगी
ज़ाहिर भी कर दूंगी तुमको
और दिखा भी नहीं पाऊँगी

पन्ना

तुम्हें ढूँढना क्या मुश्किल है ?

मेरी डायरी का कोई भी पन्ना खटखटाकर देख लो

ग़ज़ल

मुझे देखना..... जितना आसान है 
पढ़ना...... उतना ही मुश्किल 
उस रोज़ .....यूँ ही मैं शब्दों से कह बैठी 

रात महफ़िल में इक ही ग़ज़ल परवान चढ़ी ....
इश्क़ की दास्तां है प्यारे ......
अपनी अपनी जुबां है प्यारे .......

और .....
मैं अपने शब्दों को निहारती रही
शब्द मुझसे बुदबुदाते रहे

मेरी बिंदिया

पहले ......वक़्त रोक दिया करते थे दरमियां 
अबके मिले तो .......उम्र रोक कर रख दी 
मेरी बिंदिया आज भी ....सुर्ख ही भाती है ना तुम्हें ?

बेफिक्री

मेरी इस बेफिक्री का .....
ना तो लहज़ा है ...ना ही ज़ायका 
जाने क्यों....... लोग मुझे ग़ज़ल कहते हैं ?

प्रेम

नज़दीकियों और दूरियों के दरमियाँ 
"जगह" का कोई किरदार नहीं होता 
बस ....इक "वजह" होती है 
जो बेबाक बोलती हुई 
प्रेम को
स्थापित....... विस्थापित .... पुनर्स्थापित
करती रहती है
बड़ी ख़ामोशी से .....

"शिद्दत" .....

मेरा नाम आखिरी में ....धुंधला
पर.... तुम हर बार ....पुरज़ोर दिखो

"शिद्दत" .....
कुछ इस कायदे से रखना चाहूंगी कागज़ पर 

उम्र

उम्र को शब्दों से बाँध लेती हूँ......
इस लिए ज़रा...... सरकती कम है 

"शहर शब्दों का"

इक पूरा "शहर शब्दों का" सांस लेने लगता है
उस पल ....जब हम तुम संग ज़िंदा से लगते हैं


जुगनू तितली का सच

तुमने मेरा रंग ओढ़ा
और
मैंने तुम्हारी रौशनी पहन ली
रस्म थी शायद ....आखरी मुलाक़ात वाली

जुगनू तितली का सच गढ़ा है .....
देखो कुछ समझ आये तो .... मेरे इश्क़ सा


फर्क

आस पास
और
करीब का फर्क ?

इक अनचाहा ......इक मनचाहा...... बस


बाँवरी नदी

एक ही समुन्दर में ताउम्र कौन पैर डाले बैठा रहता है .........
कोई मेरी तरह ही बाँवरी नदी होगी 

ग़ज़ल

मिसरा मिसरा नहीं....
आज... क़तरा क़तरा है ग़ज़ल
सुना है ......किसी ने गिरहों का श्रृंगार किया है

आज "ग़ज़ल" सुनियेगा नहीं .....
सिर्फ देखिएगा

लम्हे...

कुछ लम्हे..... पथराए हुए भी रोज़ जीते हैं मुझमें
छू के देखिये ....मेरी डायरी की नब्ज़ चल रही
इन शब्दों में ......गर्माइश भी है अभी


तम

सोचती हूँ ....दिया क्या जलाऊँ ?
मेरा वजूद काफी होगा.......
तुम्हारा हर "तम" हरने के लिए

दीपक

जी तो बहुत था चाँद ....
तुम्हारी ड्योढ़ी पर भी इक दीपक रख आती 
अपना नाम लिख आती 
पर .... तुम हो की मेरी ही देहलीज़ पर कंदील टांग रहे 
अब ऐसा भी क्या फ़िदा होना...? 
I mean....ऐसा भी क्या रोशन होना

मोती

मेरी इस दुनिया ....
और
तुम्हारी उस दुनिया...... का फासला
अब क़दमों से तय नहीं हो पायेगा ....
चलो .......इन शब्दों की बयार बहा दूं .....
पाती पर ......कुछ मोती तुम्हारे नाम के उगा दूं

बस सामना ही नहीं होता

तुमसे मिलती तो रोज़ ही हूँ......बस सामना ही नहीं होता

कागज़

इन आँखों ने ......ताउम्र इक इंतज़ार जिया है
इन होठों ने ........ताउम्र इक इज़हार सिया है
शायद कागज़ पर

वक़्त

मेरे हिस्से का वक़्त कहाँ रखते हो ?
देखो तो सही ......
इक समुन्दर उग आया होगा वहां

चाँद

चाँद खोता .....तो मिल भी जाता
तुम तो जुदा हो गए
चाँद भी ना हुए मेरे .....और
खुदा भी हो गए

इत्र

इस फेर आओ तो ....
अपना समंदर वाला इत्र साथ लेते आना 
वो आ आ कर जाने वाली
जा जा कर आने वाली.... महक चाहिए थी 
इश्क़ का लिबास.....इक दफ़ा मैं भी तो पहनूँ 
थोड़ा समंदर .......मैं भी तो हो लूँ
वो इत्र .......मैं भी तो जी लूँ

.वजूद

बिंदिया से बिछिया तक ......
सब में तुम्हारी परछाई क़ुबूल है 
बस.....वजूद में खुद को देखती हूँ
वर्ना ये जीना भी तो फ़िज़ूल है

परिचय

बेशक किरदार बदलना मेरी फितरत है ....
पर .....
ये मेरे माथे का सूरज मेरा सटीक परिचय है

अर्थ

मैं खुद में इक संपूर्ण वाक्य सी हूं ........इक अर्थ लिए 
शब्द शब्द परखोगे तो फिरोगे मुझे व्यर्थ लिए

सुनो चाँद .....

अँधेरे की सुगबुगाहट में ....
तुम्हारा इक धेला भर होना ही ....
मुझे जलाकर राख कर देता है 
सुनो चाँद .....
तुम.... कभी मत बदलना

अक्षर ..

अक्सर सोचती हूँ तुम्हारा नाम लिख दूं .....
उफ्फ.......इन अक्षरों में उलझ जाती हूँ 
उलझी उलझी इन अक्षरों संग सो जाती हूँ ....
ख्वाबों में ये अक्षर ....
खुद ब खुद सुलझ जाते हैं 
मेरे हो जाते हैं

रात

रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद 
और ....
उसी चाँद को निगलकर मैं .....रात हो जाती हूँ

सृजन

मैं शब्दों से कहीं ज्यादा हूँ .... 
इक बार सृजन करके देखो मुझे 
ज़िन्दगी और ज़िन्दगानी में फ़र्क बूझ पाओगे

कागज़...

टूटी हुई चीज़ों को पन्नों में संजोने का शौक है मुझे 
तभी तो ...
कितनी बार कुरेदा है तुम्हें 
ना जाने कितनी बार बोया है 
मेरा कागज़.... यूँ ही नहीं लशकारे मारता

इश्किया अदब

है नहीं .....पर लगता है ......है अभी
है भी अभी..... और लगता भी नहीं 
इश्किया अदब ... मुबारक मेरे लफ़्ज़ों !

अँधेरा

कुछ तहखानों में चाह कर भी अँधेरा भरा नहीं जा सकता 
यकीन न आये तो चले आओ मुझमें....
मेरे शब्दों का पीछा करते हुए .....
मध्यम आंच में चाँद सुलगा रखा है

मेरे शब्द

मुट्ठी में ही चिपके रह गए आज मेरे शब्द 
आज तुम्हें मेरी सुरीली अँखियों ने लिखा 
जाने कहाँ.......... जाने कब तलक

अनलिखी कल्पना

अम्बार भी लगा दूं गर शब्दों का तुम्हारे आगे ....
तुम लिख न पाओगे मुझे 
अनलिखी कल्पना जो हूँ तुम्हारी 
हमेशा अनलिखी ही रहूंगी ..

"सुनो"...."कहो"

तुम्हारी...... "सुनो" का अंत नहीं था .....
इसीलिए ......मेरा "कहो" भी अनंत हो चला
मैं ......"सुनो" कहना ही भूल गयी
तुमने भी ......"कहो" कहना बिसरा दिया

"दिलरुबा"

लाओ ....कुछ चाख रफ़ू किये देती हूँ 
ज़िन्दगी...... पैबंदों में "दिलरुबा" नहीं लगती

कवायद

इसे बस इक इत्तेफ़ाक़ ही समझियेगा.... कि आप चले आये 
वर्ना.....
यहाँ कवायद तो मेरी ख्वाइशों की हो रही थी

"सिफर "

तुम्हारे लिए "सिफर " होंगी......
पर खुद के लिए "सफर" बन गयी हूँ
दिन में .....चाँद बनकर
रात में ....सूरज बनकर
रुक रुक कर चलने वाला नहीं 
ठिठक ठिठक कर गुजरने वाला
बदल लिया है खुद को
जाने कौन सी हद तलक
उस सिफर से होते हुए....... इस सफर तलक
अब .....रात में सूरजमुखी हूँ
और
दिन में रात रानी भी
और इन दोनों के बीच ......ना जाने क्या क्या
कभी यूँ ही ...... किसी रोज़
इस दिन की चमक
उस रात की दमक
हटा कर देखना
मेरे चाँद से माथे पर सूरज उगा मिलेगा
अगर मुझे बूझ पाए तो..... ठीक
अगर मुझे देख पाए तो ......ठीक
वर्ना हो सकता है .....
तुम्हें सिफर पर इक और सिफर लगा मिलेगा
उम्र "
अक्सर शब्दों के रास्ते में .....रोड़ा हो जाती है
कई बार....... वो ......
कड़वा सच लिखने नहीं देती
और.....वो मीठा झूठ पढ़ने नहीं देती
रुके रुके शब्दों की अधूरी दास्तां सी.....
ये जो देख पाते हैं वो ...
या तो उम्र लांघ देते हैं
या .......शब्दों के पार चले जाते हैं
बयां हर हाल में करते हैं खुद को
क्योंकि.....
सच को सच्चा लिखा जाना जरुरी है
चाहे मुट्ठी भर पन्नों में ही सही
यही असली हुनर है
फिर उम्र चाहे कितनी बगावत करती रहे ........
कुछ शब्द मासूम ही खूबसूरत लगते हैं .....
तो फिर चलो ......
कह देते हैं इक बार फिर.....वही
लिख देते हैं.... इक बार फिर ......वही
उम्र के परे.....
शब्द के उस पार से इस पर तक
और बीच में भी ..... हर कहीं

"तुम"

तुम मेरे लिए रेत क्यों हुए........ पहाड़ क्यों न हुए ?
तुम मेरे लिए पहाड़ क्यों हुए....... रेत क्यों न हुए ?
रेत ...पहाड़... मैं.....सब वही 
सिर्फ..... "तुम" बदल गया
पहली बार भी
और
फिर..... आखिरी बार भी

इंतज़ार

सच कहा आपने ....
किसी के पास इतना वक़्त नहीं है कि वो इंतज़ार में बना रहे। 
पर मेरे पास शब्द हैं.......
मैं उन्हें इज़हार में तो बनाये रख सकती हूँ .....आज भी 
मेरे शब्दों के पास वक़्त ही वक़्त है 
उनका इंतज़ार मुकम्मल रहेगा.....
रहेगा ना.....?

हुनर



बिना बदले ......तराशने का हुनर
सिर्फ ....
लफ्ज़ और इश्क़ के हिस्से में आया है

वजह

मेरे ख़ास होने की महज़ इतनी सी वजह काफी है .....
कि तुम आज भी मुझे ......
इन शब्दों में खोजते हो .... यादों में नहीं .......
जो वक़्त की गिरफ्त में हुआ करती हैं
और मैं तो .....बेमौसम...... बेवक्त 
तब भी हुआ करती थी और..... आज भी हूँ

जब कहीं नहीं जा पाती हूँ ....

जब कहीं नहीं जा पाती हूँ ....
तो खुद में बहुत दूर निकल जाती हूँ 
मलहम ना भी मिले 
मखमल तो मिल ही जाता है अपने आप का
अभी अभी अजनबी हुआ हुआ "मैं" .....
इक बार फिर सुर्ख गुलाब देकर
जाने कितनी बार I love u बोलता जाता है ....
और मैं बाँवरी ....I am sorry सुन रही होती हूँ ... 

इसलिए.... लौटा लाती हूँ खुद को
वापस वहीँ ......
जहाँ से फिर न जाने कितनी बार
कहीं नहीं जा पाना तय है मेरा

.बागबाँ

अजनबी ......बागबाँ हुआ जा रहा 
आँखों का कत्थई होना लाज़मी है ....

शोर

थिरकन लकीरों में लिवा लायी थी 
इसलिए आज घुँघरुओं में रेत भर ली 
कुछ तो शोर कम हो हथेलियों का

ज़िन्दगी.......

ज़िन्दगी....... 
जब भी शिकायतों से भरती जाती है 
साँसों से खाली होती जाती है

मौसम



थोड़ी धुंध...
ज़रा सी धूप...
इत्तु सी चांदनी......पड़ी रहने दो मुझ पर
तुम्हारा मौसम बना रहता है

शब्द

मेरे सन्नाटों को पढ़ने के लिए तुम्हें मेरे शब्दों से गुज़रना होगा .... 
बिना आवाज़ वाले शब्द ज़रा गहरे गढ़े हुए होंगे.....

बेरंग..

रंगों की दीवानगी थी ....
तो सोचा...... तुम्हें ही अंतस में धर लिया जाय
क्या जानती थी तुम असमानी हो जाओगे 
बेरंग........चुटकियों वाला धनुक

गुमशुदा

फिर कुछ यूँ हुआ.......... कि "तुम" हो गए 
शब्द - शब्द....... कहानी होता चला गया 
और "मैं".....उन कहानियों में गुमशुदा हो गयी

शब्द और खामोशियाँ

बोलो ....किस पर इलज़ाम लगाऊं ?
खुद पर
या ...इन शब्दों पर
या फिर... उन खामोशियों पर 
जो तुम रख कर जा रहे हो 
मुझे आदत है तुम्हारी
और ......
ये शब्द और खामोशियाँ आदी हैं मेरी
सब तुम्हारी वजह से थम गया
इतनी सारी जगह उग आई है यहाँ
अब इसमें क्या भरूं ....
शब्दों का सन्नाटा
या .....खामोशियों की गूँज

"कल्पना"

सोच रही.....
इक बार खुद को फिर से शुरू करके देखूं
आदि से अंत तक सिर्फ "कल्पना" होकर देखूं

अद्भुत ...अद्वितीय

मैं ....
इक ऐसा प्रश्न हूँ जिसके हिस्से में सवाल ही सवाल हैं
और
ऐसा उत्तर हूँ जिसके हल में सिफर ही सिफर
प्रश्न ....उत्तर
सवाल .....हल
और मैं ....मैं .....अद्भुत ...अद्वितीय

तलब .

तलब ......तीन अक्षरों का शब्द
अमूमन दो अक्षरों से शांत हो जाता है ..."तुम"

किताब

अनलिखा पढ़ने का हुनर रखते तो ...
मैं किताब ना हुई होती

शब्द



ऐसी कई कविताएं मैं अक्सर बहा देती हूँ जो मुझसे
तुम्हारे हिस्से के शब्द मांगती हैं

दुःख पारदर्शी रहे ....

ईश्वर ने आँसू को इस लिए भी कोई रंग नहीं दिया कि दुःख पारदर्शी रहे ।