सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

अर्ज़ है ....

सुनो ....
आज इस दिल को लपेट कर रख दो
बस इक हंसी रहने दो ......दरमियां
थोड़े लफ्ज़ .....खट्टे मीठे
इक टुकड़ा ....इश्क़
और वो .....वो इक हिस्सा सुकून भी 
इक साज़ ....
इक.... सरकती रात
कुछ मोगरे ....ये रंग पिघलते
इक.... जलता दिया
और रत्ती भर ......तुम
और मैं ....
मैं इन सब में ज़रा ज़रा

अर्ज़ है ....
ख्वाइशों की

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तुमने हर बार मुझे कम दिया और मैंने हर बार उससे भी कम तुमसे लिया। ना तुम कभी ख़ाली हुए .... ना मैं कभी पूरी हुई। हम यूँ ही बने रहें....हमेश...