बुधवार, 14 सितंबर 2016

इस रात ने ....उस चाँद को

इन खामोशियों को उधेड़ोगे तो मेरे शब्द नज़र आएंगे
और फिर जब इन्ही शब्द को बुनोगे तो मेरी खामोशी

जाल तो मैं शानदार बुन ही देती हूँ ... है ना ?
और तुम फंस भी जाते हो .... है ना ?

इस रात ने ....उस चाँद को
न जाने ये कितनी बार कहा होगा
और
  उस चाँद ने ....इस रात को
  न जाने कितनी बार फिर बुना होगा

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

जब तुम नहीं मिलते ....

जब तुम नहीं मिलते ....
तो खुद में ठिठक कर खड़ी हो जाती हूं ....
यहाँ वहां खो जाने से बेहतर है.......
खुद में रुक जाना

शुभ रात

सच कहूँ ... तुम्हारे पास मेरे सुकून का बक्सा है। उसमें तुम्हारा कुछ भी नहीं ... बस  कल्पना का सामान भरा हुआ है।कुछ तस्वीरें ,कुछ फिक्र,कुछ प...