Follow by Email

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

देहलीज़.....

अक्सर
देहलीज़ लाँघ कर
लम्हे
तेरी सरहद में
चले जाते हैं
सिर्फ ये महसूस करने
की तन्हाई
सिर्फ इस तरफ ही
शोर करती है
या
तेरे दायरे में
कुछ और करती है

आँखों का लहज़ा ....
रूह का जज़्बा .....
क्या वही है
तेरे दायरे में
जो मैं खुद में
इधर पाती हूँ ?

तनहा लहर ....मैं
तो तू भी
बस रुका .....समुंदर लगा
मेरी देहलीज़ से
चला लम्हा
तेरे सरहद में भी
बस रुका सा लगा
बेहद तनहा ही लगा

तन्हाई ...
सरहद नहीं जानती
कोई
देहलीज़ नहीं मानती

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें