मंगलवार, 9 अगस्त 2016

सुबह.....

सच है ....
हर बार
हर रोज़
अपने लिखे हुए की
आख़री पंक्ति में
तुम्हें ही धर के
सो जाती हूं
कि अगली सुबह
तुम ही मिलो
मुस्कुराते हुए
पहली पंक्ति में
लिखे जाने के लिए
मेरी सोच में जिए जाने के लिए

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 11 नवम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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हमेशा....

तुमने हर बार मुझे कम दिया और मैंने हर बार उससे भी कम तुमसे लिया। ना तुम कभी ख़ाली हुए .... ना मैं कभी पूरी हुई। हम यूँ ही बने रहें....हमेश...