मंगलवार, 9 अगस्त 2016

मलहम.....

जब कभी हारने लगो तो ....
शब्दों का मलहम नहीं
अपने से.....
अपनी ख्वाइशों के वादों का इक टुकड़ा
खुद पर रख लो
जख्मी हौसलों को आराम मिलेगा
इक बार फिर इक नया आयाम मिलेगा

1 टिप्पणी:

  1. कल्पना जी आपकी इस रचना की कविता मंच ब्लॉग पर साँझा किया गया है

    संजय भास्कर
    कविता मंच
    http://kavita-manch.blogspot.in

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पूर्ण विराम

रुकने के लिए मेरे पास पूर्ण विराम भी था पर तुम ज्यादा पूर्ण थे....मेरे विराम के लिए।