बुधवार, 31 अगस्त 2016

इंसान और धरा....

इंसान हो.....
सुना है .... रिश्ते निभाने में माहिर हो
फिर मेरे लिये ही क्यों ?
हर रिश्ता समेट कर बैठ जाते हो
सारी अनुभूतियाँ लपेट कर बैठ जाते हो
कितना कुछ पनपा लेने का फख्र हासिल है मुझे
पर खुद के लिए तुमसे इक शून्य ही पनपा पायी हूँ
अपना ही दुःख आज तलक नहीं समझा पायी हूँ

पृथ्वी ....धरा
भूमि.... वत्सला
बस...... नाम ही तो दिया है तुमने मुझे
इस लिए शायद
नाम भर का ही रिश्ता रखते आये हो
भाई होते तो.... संजो के रखते अपने हाथों पर ,
पिता होते तो ......उठाये फिरते अपने काँधों पर ,
माँ होते तो ....उढ़ाते जाते धानि चुनरिया ,
बहन होते हो ....बढ़ाते जाते मेरी उमरिया

जाओ.....
मेरे लिए भी कोई रिश्ता गढ़वा लाओ
ये" देने -लेने"  के अलावा
मेरे लिए भी कोई ख़ास वजह मढ़वा लाओ
सुना है..... तुम इंसान हो
सुना है .....काफी महान हो

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