बुधवार, 31 अगस्त 2016

मायावी.....

जब होते हो .....
तब भी कितना कम होते हो मेरे पास
और जब नहीं होते......
तो कितना ज्यादा

तुम भी ...... अपने शब्दों की तरह मायावी हो

सीमा....

इक बात कहूँ...?

मेरे लिए सीमाएं बनाना ......
और फिर....... खुद अपनी तोड़ देना
कोई ......."तुमसे"  सीखे

और ......सीमाएं लांघना....... "सिर्फ मुझसे "

शब्द.....

चीखते नहीं मेरे शब्द
बस .....गुनगुना देते हैं तुम्हें
सच कहा तुमने......" सयाने " हो गए हैं

इंसान और धरा....

इंसान हो.....
सुना है .... रिश्ते निभाने में माहिर हो
फिर मेरे लिये ही क्यों ?
हर रिश्ता समेट कर बैठ जाते हो
सारी अनुभूतियाँ लपेट कर बैठ जाते हो
कितना कुछ पनपा लेने का फख्र हासिल है मुझे
पर खुद के लिए तुमसे इक शून्य ही पनपा पायी हूँ
अपना ही दुःख आज तलक नहीं समझा पायी हूँ

पृथ्वी ....धरा
भूमि.... वत्सला
बस...... नाम ही तो दिया है तुमने मुझे
इस लिए शायद
नाम भर का ही रिश्ता रखते आये हो
भाई होते तो.... संजो के रखते अपने हाथों पर ,
पिता होते तो ......उठाये फिरते अपने काँधों पर ,
माँ होते तो ....उढ़ाते जाते धानि चुनरिया ,
बहन होते हो ....बढ़ाते जाते मेरी उमरिया

जाओ.....
मेरे लिए भी कोई रिश्ता गढ़वा लाओ
ये" देने -लेने"  के अलावा
मेरे लिए भी कोई ख़ास वजह मढ़वा लाओ
सुना है..... तुम इंसान हो
सुना है .....काफी महान हो

समुन्दर....

आज समुन्दर को समुन्दर से गुजरते हुए देखा
जो कोई देख न सके वो मुझ से कहते हुए देखा

रात रानी.....

लो...... चाँद भी बुझा दिया
अपने शब्दों की लौ भी कम कर दी
मुस्कुरा देते तो.... रात रानी खिल जाती

हम....तुम

हम जुदा तो हुए...... फिर हासिल हो गए
तुम खुदा भी हुए ....   क्यों साहिल हो गए

खूबसूरत.....

कौन कहता है ...तुम "खूबसूरत" हो ?

ये तो "शब्द" हैं मेरे .....
जो तुम पर खूब फबते हैं
छूते हैं तुमको ....
और खूब हँसते हैं

प्रारब्ध....

करीब से देखोगी तो .....मुझमें शब्द मिलेंगे
और 
बेहद करीब से प्रारब्ध

कल्पना ने कल्पना से कहा .....☺☺☺☺☺

परछाई.....

वो सारे शब्द .....
जिनमें तुम्हारी परछाई थी ......दूर तक गए
शायद  पहुँच गए
बाकि तो बस थक कर बैठ गए हैं ....
  किसी किताब के किसी मुड़े हुए हर्फ़ पर

ज़ाहिर....

जरूरी नहीं .....कि लिख देने भर से
मैं  "ज़ाहिर " हो जाऊं
ज़ाहिर कर देने वाले मेरे शब्द पारदर्शी हैं ....
सब ही को दिखते हैं
बस गिने चुनों को महसूस होते हैं ....
और ज़ाहिर .......

सफर....

कुछ ख़त ....
अपनी लकीरों में "सफर " ही लिखवा कर लाते  हैं ....
पहचानते हैं अपना मंज़िल ........
पर...
दो कदम पहले रूक कर ........लौट आते हैं
क्योंकि....
वो पहुंचना नहीं .......मंज़िल पाना चाहते हैं

असीम मैं .....अनंत वो

कह देती हूँ अपनी ख्वाइशें इस समुन्दर से
इक वही है जो पलटकर हामी भरता है
असीम मैं .....अनंत वो
Perfect combination
Mutual admiration

शब्द.....

जब शब्द "स्त्री" होते हैं तो .....
कितना कुछ कह जाते हैं ........"पुरुष" को
और
जब कभी "पुरुष" होते हैं तो .......
जाने क्या क्या कह जाते हैं ......."स्त्री" को

शब्दों को शायद कुछ नहीं होना चाहिए ....

जन्मदिन मुबारक अमृता जी ....

शब्दों से इमरोज़ तो बहुत मिल जाते हैं ...

पर अमृता वाला इमरोज़ तो फिर हुआ ही नहीं ....
जैसे इमरोज़ वाली अमृता फिर कभी नहीं हुई ....

जन्मदिन मुबारक अमृता जी ....
इश्क़ मुबारक अमृता जी.....

कल्पना पांडेय

रविवार, 14 अगस्त 2016

तस्वीर.....

तस्वीर नहीं....
मेरा दर्द खींच पाओ .... तो कुछ बात बने

प्रेम.....

आसपास ....
इतने शब्द ......इतनी संवेदनाएं
बिखरी पड़ी हैं कि ......
जिसे उष्मा दो ......वो बोल पड़े....
बस .....
मन का अलाव ......प्रेम से सुलगा होना चाहिए

विकल्प.....

कभी कभी ....
शब्दों को घोल कर.....पी जाना भी
इक बेहतरीन विकल्प हो सकता है .... 

अपने "मैं" को ...यूँ ही .....क्यों जाया करना ?

मैं.....

कुछ तो आकार होता ही होगा इन शब्दों का.......

या तो.....
नुकीले होते होंगे
रूह से लहू रिसाने वाले
अपना "मैं"..... चुभाने वाले

या फिर....

  गोल गोल घिसे हुए
रूह से रूह सहलाने वाले  
मेरा "मैं"...... दिखाने वाले

इनके आकार..... प्रकार से ही तो "मैं " जीवित है
मेरा भी.....
तुम्हारा भी .....

शिफा....

ये सलवटें....
ये झुर्रियां......
तुम्हें तो बुढ़ापा ही लगेगा

मेरे लिए तो ......शिफा सा है
जो हर तज़ुर्बे के संग...... हमनवां हुआ

शिफा ..... healing

इख्तियार.....

इक ख़ामोशी..... दरमियां
पर सदियों से इक दूजे में रुके हुए
ये शायद इख्तियार ही हुआ ना....?

बंजारन....

मेरा पता ...."ज्यादातर तुम "

कभी कभार ........
"बंजारन"हो जाना भी सुकून देता है
तब खोजती हूँ ...
खुद को ...कल्पना वाले .....पुराने पते पर

अधूरी नज़्म....

अच्छा हुआ ....तुम मेरे लिए अधूरी नज़्म ही रहे
देखो ..........अब तलक रुके हुए हो जहन में
ये अलग बात है कि ......
रोज़ इक कहानी लिखकर आज़ाद कर देती हूँ ....
खुद को।

भाषा.....

आइये रूह की भाषा बोलें .....
देह ..... स्नेह की तो हर कोई बोल सकता है

मायने बदलने होंगे .... मेरे भी ... अपने भी

(सादगी बेजोड़ है ...नजरिया भी बेजोड़ ही होना चाहिए)

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

शब्द......

कभी कभी होता है ऐसा भी ...
कि मेरे शब्द भी इक खिंचाव महसूस करते हैं
पता नहीं क्यों ....
पता नहीं किसके लिए ....
खाली हो जाना चाहते हैं
फिर फिर भर जाने के लिए ....
कोई चेहरा नहीं
कोई आवाज भी नहीं
कोई अतीत
कोई वर्तमान भी नहीं 
पर हैं कुछ शब्द
शब्द नहीं ......शब्द विशेष जो
पिघल जाना चाहते हैं
खुद को ठोस करने के लिए  ....
ऐसा नहीं की तलाश रहे हैं कुछ
या खो दिया है कुछ ...
बस .....इक सुगबुगाहट
बस ....इक आहट कि हूँ ..... मैं यहीं कहीं हूँ
तुम्हारे शब्दों कि बाट जोहता

शब्दों से बहकना
और
शब्दों से बहल जाना
बस यही सीख पायी हूँ आज तलक

और देखा ....आज फिर तुमने टरका दिया
कुछ उलझे से शब्द भेज कर

सुबह.....

सच है ....
हर बार
हर रोज़
अपने लिखे हुए की
आख़री पंक्ति में
तुम्हें ही धर के
सो जाती हूं
कि अगली सुबह
तुम ही मिलो
मुस्कुराते हुए
पहली पंक्ति में
लिखे जाने के लिए
मेरी सोच में जिए जाने के लिए

इंद्रधनुष......

तुम...... हमेशा से मेरे लिए
वो बारिश की बूंदें रहे हो
जिससे गुज़रती हूँ तो ......
इंद्रधनुष हो जाती हूँ
ये और बात है कि....
मेरा इंद्रधनुष.....
सिर्फ इक लकीर है...
जो सुर्ख लाल है .... सदियों से

"तुम" तो mandatory हो....

खुद का....सिर्फ खुद
हल ढूंढने जैसा है .....तुमसे मिलना
दूर और पास
मायने नहीं रखता .....अब
बस..... कुछ पल 
मैं ....
और शायद फिर ....इक नयी ....मैं

"तुम " नहीं लिख रही  ... "तुम" तो mandatory  हो

बूंदें....

बारिश की बूंदें... "on "होते ही
हर चैनल पर इश्क़ बज उठता है ....
अरे ! मैं "fm radio " की बात नहीं कर रही ...
आपकी
और
अपनी बातें बतिया रही हूँ ...
Enjoy .... happy rainy weekend .... ☺☺☺☺☺

देहलीज़.....

अक्सर
देहलीज़ लाँघ कर
लम्हे
तेरी सरहद में
चले जाते हैं
सिर्फ ये महसूस करने
की तन्हाई
सिर्फ इस तरफ ही
शोर करती है
या
तेरे दायरे में
कुछ और करती है

आँखों का लहज़ा ....
रूह का जज़्बा .....
क्या वही है
तेरे दायरे में
जो मैं खुद में
इधर पाती हूँ ?

तनहा लहर ....मैं
तो तू भी
बस रुका .....समुंदर लगा
मेरी देहलीज़ से
चला लम्हा
तेरे सरहद में भी
बस रुका सा लगा
बेहद तनहा ही लगा

तन्हाई ...
सरहद नहीं जानती
कोई
देहलीज़ नहीं मानती

मलहम.....

जब कभी हारने लगो तो ....
शब्दों का मलहम नहीं
अपने से.....
अपनी ख्वाइशों के वादों का इक टुकड़ा
खुद पर रख लो
जख्मी हौसलों को आराम मिलेगा
इक बार फिर इक नया आयाम मिलेगा

मायने.....

आइये रूह की भाषा बोलें .....
देह ..... स्नेह की तो हर कोई बोल सकता है

मायने बदलने होंगे .... मेरे भी ... अपने भी

(सादगी बेजोड़ है ...नजरिया भी बेजोड़ ही होना चाहिए)

दर्द....

तस्वीर नहीं....
मेरा दर्द खींच पाओ .... तो कुछ बात बने

अपेक्षाएं......

तुम चाँद ......
तुम्हारे हिस्से का आसमान .....
तुम्हारी नीली चांदनी  ......
और तो और .....
ये रात भी सगरी तुम्हारी  ......
और मैं .....
मैं तो बस ........मैं  
इक दिन हो सके .....
तो मेरी अपेक्षाएं भी ......ओढ़ के देखना
बेहद ...........अलग लगोगे
सिर्फ .....इक बार 
बस .....यूं ही

उष्मा....

आसपास ....
इतने शब्द ......इतनी संवेदनाएं
बिखरी पड़ी हैं कि ......
जिसे उष्मा दो ......वो बोल पड़े....
बस .....
मन का अलाव ......प्रेम से सुलगा होना चाहिए

सादगी

सादी सी बात सादगी से कहो न यार ....   जाने क्या क्या मिला रहे ..... फूल पत्ते   मौसम बहार सूरज चाँद रेत समंदर दिल दिमाग स...