बुधवार, 8 जून 2016

क्षितिज .......

ऐसे कितने पल हैं ....
कितने ही मंजर हैं ....
जिन्हें मैं छू आई हूँ अब तलक
ना जाने अब भी कितने और बाकी हैं 
जिन्हें छूना चाहती हूँ ....
बस ......शब्दों की नदी है ....
मैं हूँ .....
और ......
तुम हो...... मेरा सा क्षितिज लिए हुए

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