रविवार, 12 जून 2016

किस्म....

अपनी किस्म का सिर्फ एक हूँ ....
फिर भी पूछता फिरता हूँ .... 
क्या मैं सही हूँ?

बुधवार, 8 जून 2016

निर्वात.....

मैं थी ......
मैं हूँ ....... 
मैं रहूंगी .......
इनके बीच के फासलों में 
शब्दों का कोलाहल
भरा था .....
भरा है .....
भरा ही रहेगा .....
और बस....
इक "कल्पना "होंगी ....
निर्वात लपेटे

ग़ज़ल....

बस .....
कुछ शब्द ही हैं ....
जो बिना शर्त
मुझे ....हूबहू लिख देते हैं
तुम्हारी ख्वाइशों पर
बाक़ी सब तो .....
फरमाइशी ग़ज़ल सा है
मेरे लिए

क्षितिज .......

ऐसे कितने पल हैं ....
कितने ही मंजर हैं ....
जिन्हें मैं छू आई हूँ अब तलक
ना जाने अब भी कितने और बाकी हैं 
जिन्हें छूना चाहती हूँ ....
बस ......शब्दों की नदी है ....
मैं हूँ .....
और ......
तुम हो...... मेरा सा क्षितिज लिए हुए

गुरुवार, 2 जून 2016

मेरी मुस्कान .......

मेरी "मुस्कान" से अक्सर मेरे "शब्द "
उलझ पडते हैं
कहते हैं कि....
smile travels faster than sound ....
ये तुम्ही इज़ाद कर सकती हो

पर आप सब तो जानते हैं ना....
मेरे शब्दों से .......मेरी मुस्कान है
और
मेरी मुस्कान में ...... मेरे शब्द

सादगी

सादी सी बात सादगी से कहो न यार ....   जाने क्या क्या मिला रहे ..... फूल पत्ते   मौसम बहार सूरज चाँद रेत समंदर दिल दिमाग स...