सोमवार, 30 मई 2016

Cheers !

मैं ....
अपनी ख्वाइशों का प्याला
रोज़ ...
दो ही चीज़ों से भरती रहूंगी
कभी जीत से ...
कभी उस जीत को पाने की रीत से
वो क्या कहते हैं.... हर जश्न के बाद .... Cheers !

wave length.....

कुछ एहसास....
ख़ामोशी ओढ़े भी
मीलों लंबा सफ़र तय कर आते हैं... रोज़
कभी राह नहीं भटकते
उन्हें छू आते हैं...... रोज़
बिना कहे....
बिना लिखे ....
दे आते हैं...... रोज़
मुझे...... ज़रा ज़रा
एहसासों की खामोशियों में भी
सही कहा .....
wave length match करती है हमारी

रवायत......

आसमां में फूल खिला देना.... 
गलत नहीं .....
 सम्भवत :
 इक अलग सोच की रवायत है.....

हद ....



प्रेम की कोई हद नहीं होती
इसीलिए तो सब बंधते चले जाते हैं
अगर कोई होती
तो सब उड़ते चले जाते
फिर प्रेम कहाँ.....
हद कहाँ......
बेहद कहाँ .....
कोई कहाँ .....
कोई कहाँ ......
ये बेहद वाली परिधि में प्रेम सदियों से पनप रहा है
बिना कहे
बिना सुने
बिना देखे
बिना दिखे
हंसी ख़ुशी
हौले हौले
बड़े इत्मीनान से बस सदियों से धड़क रहा है

मैं .......खूबसूरत नज़र आती हूँ

लिख कर तो देखो .......मुझे इक बार .....
इस ख़ामोश स्याही से
उस खामोश पन्ने पर
इस खामोश कलम से
उन खामोश लफ़्ज़ों में घोल कर 
जो बड़ी ख़ामोशी से
मेरी खामोशियों को
बस खामोश करना जानते हैं
बस आगोश करना जानते हैं
इन खामोशियों को सुनो ....
मैं .......खूबसूरत नज़र आती हूँ

सफ़र ....

उस बाहरी शोर की तरंगें ......
मेरे आतंरिक उफान से मेल नहीं खाती
इस लिए ...
हम दोनों का खामोश हो जाना
और 
चुपचाप अपने रस्ते चलते चले जाना ठीक रहेगा
मिलेंगे इक बार फिर .....
शोर और उफान के साथ ....
किसके हिस्से .....कितना क्या क्या होगा ?
ये हम नहीं ......
हमारा सफ़र बताएगा

खामोश लम्हे .....

कुछ खामोश लम्हे .....
मैंने अपने पहलु में
सी लिए हैं  
डरती हूँ ....
उड़ न जाए
ये खामोश लम्हे .....
कहीं
दिख न जाएँ
ये खामोश लम्हे .....
मुझसे तो
कुछ कहते नहीं
क्या पता
तुमसे ही
सब कह जाए
ये खामोश लम्हे ......

रविवार, 15 मई 2016

वजह और बहाने ......

वजह तय करने ...
और
बहाने तय करने के बीच में ही ....
कई बार हमारे "ख्वाब "मर जाते हैं
क्यों ...?
कैसे ....?
और
क्यों नहीं....?
सिर्फ ये तीनों तय करते हैं कि ....
हमारे ख्वाबों की उम्र  क्या होगी ?

सोच के देखिये आप ....
सकारात्मक कश्ती में बैठे हों
या
  नकारात्मक हवाई जहाज में

वजह तय कीजिये....
बहाने अपने आप तय हो जायेंगे

शुक्रवार, 13 मई 2016

आसान है....

इस मायूस रात के ......
सैकड़ों सितारों से बातें करने से बेहतर है
उस उजले दिन के ...
सूरज की आँख में आँख डाल कर देखना
करके देखिये ....ज्यादा आसान है

देव....

क्या जिद्द पाले बैठे हो .....देव 
सम्भलो .....रुको तो सही 
मत बांधो एहसासों के पाँव में
शब्दों के घुंघरू
ये बेरब्त हुए जा रहे है 
थम जाओ .....
समझ जाओ....
ये आसक्त हुए जा रहे हैं
जख्मी कर देंगे ये खनक के
ऐसे ही यहाँ वहाँ भटक के
सुनो ......
मान भी जाओ .....
बंद करो ये शोर एहसासों का
ये वक़्त नहीं ऐसी बातों का
दर्पण उठाओ .......
देखो तो सही
जो अंतस में तुम्हारे
मैं वो रत्ती भर भी नहीं
अब बस भी करो .....
चुप हो जाओ
अर्ज़ सुन लो ......
जानते हो न मुझे मौन की आदत है
यही बस ....यही कर जाओ .......
बस ऐसे ही सिमट जाओ ......
मेरी चुप से लिपट जाओ ......देव

बुधवार, 11 मई 2016

बेमायना....

आदतन तुम कहोगे नहीं ....
और
आदतन मैं पूछूंगी नहीं.....
लफ़्ज़ों को "बेमायना" करना भी क्या कम हुनर है ?
वो भी..... बेबाक सन्नाटों में

मंगलवार, 10 मई 2016

"ख्वाब" .....

तुम..... मेरी ज़िन्दगी का वो बेहतरीन हिस्सा हो
जो ....मिला
बिछड़ा
रुका
चला
पर ......आज तलक थका नहीं
इसीलिए तो कहती हूँ ....
बस इक "ख्वाब" से हो

रविवार, 8 मई 2016

बचपन....

सब कुछ है मेरे इख्तियार में ......
बस .....वो बचपन की मासूमियत
मेरे हिस्से नहीं आती
सच है .....
उम्र की किताब ....... फिर पलटी नहीं जाती

अजनबी....

न जाने कितनी बार.....
दोहराये जा चुके हो तुम .....मुझमें
  फिर भी .....
हर बार जरा सा ......
अजनबी ही रह जाते हो
हूबहू .....मेरे शब्दों की तरह

इश्क़ .....

इश्क़ तो इस छोर भी 
उठ रहा वैसे ही
जैसे उस छोर है
कुछ धुँआ सा 
कुछ धुंध सी
मैं
तुम
और हमारा सा
के बीच
अब तलक तैरता
छू कर देखो शायद...... यही इश्क़ है

अधखिलेे फूल ....

किसी और के
कहने भर से
अपने ख्वाबों के
अधखिलेे फूल
तोड़ देना.....
इससे बेहतर है
मैं उन्हें खुद पर
लादे रखना पसंद करूंगी ....
पूरा खिलने तक
खुद पर
सूख जाने तक

समुन्दर.....

जा जा कर लौट आना...... कोई तुमसे सीखे 
तुम कोई .....कम समुन्दर रहे हो मेरे लिए ?

कहानी......

खुद से बातें करती हूँ .... 
तो कहते हो .....कविता सी हूँ 
मेरे लिए 
तब
तुमसे बतियाना तो 
कहानी ही हुआ ना मेरे लिए ?

ख़ामोशी .....

उस असीम ख़ामोशी को छूना....
वो भी शब्दों से ..... 
या तो..... सिर्फ मैं ही कर सकती हूँ 
या..... सिर्फ तुम ही समझ सकते हो

"वजह" ......

नज़दीकियों और दूरियों के दरमियाँ 
"जगह" का कोई किरदार नहीं होता 
बस ....इक "वजह" होती है 
जो बेबाक बोलती हुई 
प्रेम को
स्थापित....... विस्थापित .... पुनर्स्थापित
करती रहती है
बड़ी ख़ामोशी से .....

जुगनू ....



ओह !
अब ये जाना ....कि मेरा लिखा
हर शब्द
तुम्हें जुगनू क्यों लगता है .....
प्रेम में हूँ ना ......मैं 
और तुम भी.... कदाचित
ये मैं नहीं ....
अमृता जी कहती हैं.....
"मुहब्बत का एक लफ्ज
जब किसी की आत्मा में
चिराग की तरह जलता है
तो फिर जितने भी अक्षर
उसके होंठों पर आते हैं
वे रोशनी बाँटते हैं
थैंक्स अमृता जी ....
लेखनी के जुगनू मुबारक..... मुझे

अनुगूंज ...

मूक रहने में 
और 
दो टूक कहने में
सिर्फ इक ही अनुगूंज होगी
मेरे वजूद की

छू के देखिये .... अलग हैं

अकेलापन
तन्हाई
और
एकांत
सब इक ही साँचे में ढले लगते हैं 
छू के देखिये .... अलग हैं
अकेलापन ......मिलता है .......अपनों से
तन्हाई ........होती है ......अपनी बुनी हुई
और
एकांत .....चाहिए होता है ....अपने लिए

मैं.....

मेरे जेहन की उस इक टुकड़ा धूप को खुरच के देखो ....
तुम्हें मध्यम आंच में रौशनी परोसता चाँद ही नज़र आएगा
थोड़ी अलग हूँ ना मैं ?
भूल गए ?

विश्वास.....

कभी "विश्वास" को ध्यान से सुनियेगा .....
"विश्व "भी चीखता नज़र आएगा
"स्व" भी बोलता नज़र आएगा
ये हम पर निर्भर है कि ...
हमारी "आस "को किसकी गूँज ज्यादा भाती है
किसकी आवाज लौट लौट कर आती है
विश्वास तब बोलता नहीं
सिर्फ कर के दिखाता है

अजनबी....

समन्दर भर के शब्द लायी थी तुम्हारे लिए
और तुम हो कि इक निगाह में सोख लिए ....
अब ऐसा भी क्या "अजनबी" होना ?

सिफर...

सतत रहोगे 
तुम मेरे लिए 
और 
अनवरत भी
"शब्द " की तरह 
तरतीब से लग गए तो ....मेरी कहानी से
बेतरतीबी में भी..... मेरे लिए रूहानी से
और मैं ....
मैं "सिफर" रहना पसंद करुँगी
तुम्हारे साथ भी
तुम्हारे बिना भी

कश्मकश ...

कश्मकश ये नहीं कि ...
मैं कितने पग आगे बढ़ूँगी 
या 
कितने पग तुम्हारे अपनी तरफ बढ़ाने दूँगी 
कश्मकश ये है कि ...
मैं किस हद तक तुम्हें जी सकुंगी...
सुनो ख़्वाबों ....
तुमसे कह रही हूँ ...
मैं आ रही हूँ....

विकल्प.....

सोच ही नहीं ....
आपके शब्दों का चयन भी
आपके ख्वाबों का blue print उकेरता है
स्थिर शब्द...... स्थिर सोच विकल्प नहीं रखते 
लचीले शब्द.... लचीली सोच संकल्प नहीं रखते
अब आप.... "या" को चुनिए
कि "यही " को चुनिए
आप पर निर्भर करता है
सोच भी आपकी शब्द भी आपके
पर ये सच...... हम सबका
विकल्प खुले रखना ....
ख्वाबों को सिर्फ शामिल करने जैसा है
और सिर्फ यही विकल्प रखना ...
ख्वाबों को हासिल करने जैसा 

शब्द ....

झूठ नहीं कहूँगी ...
बड़ी बेतरतीबी से फैले रहते हैं मेरे शब्द ।
ऐसा नहीं कि मुझे
रख कर भूल जाने की आदत है
ये खुद पसंद करते हैं
हर कहीं जरा जरा
अपना अस्तित्व टिका देना
कागज़ तो बस ....
नाम भर का संगी है
मेरे शब्द तो ....
मलंग मनमौजी अतरंगी हैं

बर्फ...

इतने साल..... पिघल गए हमारे दरमियाँ 
"उस बार" की बर्फ पिघलाएं नहीं पिघली

सादगी

सादी सी बात सादगी से कहो न यार ....   जाने क्या क्या मिला रहे ..... फूल पत्ते   मौसम बहार सूरज चाँद रेत समंदर दिल दिमाग स...