सोमवार, 4 अप्रैल 2016

ख्वाब

ख्वाब ....मेरे हमराह भी 
करते मुझे .....गुमराह भी 
जीवन ....
ख्वाइशों सा .....हरा भरा 
इक ख्वाब पूरा हुआ तो .....
इक उग आया .... ज़रा ज़रा
ख्वाब .....
रोज़ उगते ...
पलते ...
मिटते हैं
गर अधूरे रहे ....
तो आँख से रिसते हैं

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तुमने हर बार मुझे कम दिया और मैंने हर बार उससे भी कम तुमसे लिया। ना तुम कभी ख़ाली हुए .... ना मैं कभी पूरी हुई। हम यूँ ही बने रहें....हमेश...