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गुरुवार, 17 मार्च 2016

खरगोश और कछुआ....

उस बार जो दौड़े थे ना रेस में.....
अरे वही .....खरगोश वाली .....
हां -हाँ ....वही तेज़ तेज़ _धीरे धीरे वाली ....
बस ....बस  वही तुम्हारी जीत वाली .....
तब से ......आज तलक
उसी जीत के खोल में दुबक कर बैठे हो ....
देखो .....कितनी रातें निगल चुका सूरज  ....
कितनी चांदनी....... पी गया वो बादल ......
पर तुम .....बस पसरे ही रहे  ....
वो क्या कहते हैं उसे .....
अंग्रेजी में.....
हाँ .....याद आया "comfort zone"

पर ......हैं ना कुछ "खरगोश" .....
जो तज़ुर्बा खाते हैं .....
और
आत्म बोध पीते हैं ....
जीत अब मायने नहीं रखती उनके लिए ....
वो तो जगजाहिर हो चुके ....
अपने हुनर के माहिर हो चुके

और तुम.....
तुम बस .....नकारात्मक खोल में ही दुबके रहना....
बातें बनाना .....और बातें ही खा लेना
अब जाना ....
कि तुम्हें अपना nickname ....
कछुआ क्यों पसंद है .....
खोल वाला प्राणी ......थोडा odd है ना

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