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गुरुवार, 10 मार्च 2016

सुन्दर हूँ ना मैं ?

जब जब रात जागती है मेरे साथ
और......
दिन ऊँघता हुआ गुज़र जाता है ....
तारे ...घूरते नज़र आते हैं
और ये ....ये मुआं बादल ...
मुझपर पसर जाता है ....
क्या बताऊँ .... कैसा लगता है ?
खुद में ही धंस जाने को जी करता है ....बस
हवा को निचोड़ कर....
पी जाने को जी करता है...... बस

लगता है ......बस अभी ये मंज़र पलट जाये
ये काला .... भूरा जो भी है सिमट जाए
ताज़ा ख्वाइशों का झोंका आये
बस ....मुझे छू जाये
मुझमें ....मेरा सा ही
कुछ....  नया गुज़र जाये
इस सीले पन को .....सोख ले कोई इक बार फिर
मुझे बिखरने से....... रोक ले कोई इक बार

उस "कोई"....... में भी दूर तक....आज भी
  "मैं "ही "मैं" नज़र आई
इस लिए.... खुद ही खुद मन की तार से
ख्वाइशों का दुपट्टा खींच कर ..... लपेट लिया
इक सिरे में....उमींद के फूल
दूसरा ....."कल्पना" हिरणी को थमा दिया
देखो....
उमींद की कुलांचे भरती  ....कल्पना हिरणी ...."मैं "

बोलो ....अब ज्यादा सुन्दर हूँ ना मैं ?

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