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गुरुवार, 3 मार्च 2016

शब्दों की कॉलोनी"......

शब्दों की कॉलोनी" में आए हुए ....
कुछ ही अरसा हुआ
इससे पहले ....जी तो रही थी ...
पर ....कह नहीं रही थी
देख तो रही थी ...
पर ....दिखा नहीं रही थी

मेरी नज़रों से देखोगे .....
तो कॉलोनी का हर "घर" .....
इक खुशहाल "शहर" नज़र आएगा

"सामान " ?
इक कलम ....
कुछ रोशनाई ....
कुछ उजले काले पन्ने ...
और .....
ठसाठस भरे मुस्कुराते शब्द .....

"नज़ारा" ?
कल्पना की ....सड़क
तजुर्बे  के .....दरख़्त
एहसासों का ....आसमान
बेबाक .....चाँद सूरज
और .......
मेरी कॉलोनी के बन्दे ...

"बन्दे" कैसे ?
समझ लीजिये .....
शब्दों की चलती फिरती "दुकान".....
"फर्क" ?
कुछ ख़ास नहीं ....
किसी की नयी ....किसी की पुरानी
किसी की बड़ी .....किसी की छोटी
कोई ठेला खोमचा लगाकर भी ....
  शब्द उभारता हुआ
 
"हालात" ?
सब खुश ....
सब प्रसन्न ....
सब मदभरे.....
अपने अपने शब्दों की जीत पर
अपने हिस्से कीे कागज़ से प्रीत पर

"व्यवसाय" ?
कुछ सफल शब्दों के मालिक
कुछ गुमनाम शब्दों के सौदागर
कुछ साहित्यिक शब्दों के हाकिम
कुछ आभासी दुनिया के बाज़ीगर
पर सब का इक ही .....तख़ल्लुस..... "कलमकार"

शब्दों की कॉलोनी में ....
अदृश्य शब्दों से बंधे हम सब ....
कभी  दूर .....कभी पास
पर ......
जाने कैसे.....
सब एक जैसे ....आसपास

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