रविवार, 14 फ़रवरी 2016

बचपन......

आओ ....
बचपन में गोता लगा आएं
माँ के आँचल में ....
चाँद सोया है 
चलो ...
उठा लाएं  

कितना कुछ रह गया है ....करने को  
कितना कुछ अभी बाकी है 
मुद्दत हो गयी संग खेले हुए 
जाने कब से ना गप्पें हाँकी है 

ये भी कर लूं ....
वो भी कर लूं ......
दो पल रुक तो ज़िन्दगी 
पीछे मुड तो ज़िन्दगी
 कितना कुछ रह गया है ......करने को  
 कितना कुछ अभी बाकी है 

 परी और .....चाँद की झड़प 
 तितली को ....छूने की तड़प
 अमिया का पेड़... दो चार लपक 
 कागज़ की किश्ती .....पानी में छपक 
 गेंद और गिल्ली .....बल्ले की धमक 
 गुड्डे की गुड़िया संग ....ब्याह की ललक                  तोतले बोल .....नाच और ठुमक
भरी दोपहरी .....खेलने की सनक 
खिलौनों की और .....कंचों की कसक 
दोस्तों और ......पतंगों की फड़क
माँ की गारियां...बाबा की हुड़क  

 कितना कुछ रह गया है करने को  ......
 कितना कुछ अभी बाकी है 
 दो पल रुक ज़िन्दगी 
 पीछे मुड चल ज़िन्दगी 

आओ ....
बचपन में गोता लगा आएं
माँ के आँचल में ....
चाँद सोया है 
चलो ...
उठा लाएं  

कल्पना पाण्डेय 

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