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बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

पग नहीं......पींगें भरेगा सूरज

कभी कभी ....
दिन उगकर ......बिना पग बढ़ाये ही
  डूब जाता है
  उस दिन..... सूरज नहीं .....
  "मैं "शून्य सी उतरती जाती हूँ
  असीम गहरे सागर में
 
  खोजती हूँ ......त्रुटियाँ
  बीनती हूँ ......कमियां
  खरोंचती हूँ ....कुछ प्रश्न .....वजूद पर
  लिखती हूँ  ..उत्तर ...अंतस मौजूद पर
  कभी विचलित .....
  कभी संयमित होकर
  कभी भ्रमित....
  कभी द्रवित होकर
 
फिर उठकर ....
आगे बढ़कर ....
पिछले दिन का सूरज
मरोड़ कर  
अतीत की मांद में
तोड़ कर

लपक लाती हूँ ....कुछ संकल्प
ठोस वाले ....
जरा जरा ....आक्रोश वाले
सेकती रहती हूँ ....अन्तर्मन् की आंच पर
हौले हौले कटती सरकती रात भर
गढ़ जाती हूँ इक चौकोर सूरज
उगने वाला और ढलने वाला
पर.....
पग नहीं .....पींगें भरने वाला
आज ...
शून्य नहीं होने देगा सूरज
पूरब से पश्चिम को नहीं
मेरे इशारों पर चलेगा सूरज
इन इरादों पर गलेगा सूरज
पग नहीं पींगें भरेगा सूरज
मेरे लिए ....
मेरे "मैं" के लिए

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