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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

तुम्हारा .....सिर्फ तुम्हारा

वो हवा का झोंका उस पल उड़ा ले गया
छुआ तक नहीं और सिहरन दे गया

मेरे दुनिया में दबे पाँव चला आया
न उसको मेरी गरज़ थी न मैंने उसे बुलाया

सिलसिला लफ़्ज़ों का जुड़ता चला गया
धड़कन रुक गयी दिल बढ़ता चला गया

उसका अंदाज़ मेरा दोस्त बन गया
उसका नशा मुझे मदहोश कर गया

उसकी आवाज़ बुलाती थी मुझे
उसकी रूह सहलाती थी मुझे

अनछुए अहसासों को वो चख गया
तन्हाई को कुछ पल के लिए ढँक गया

वो एक लम्हा जी गयी
कभी न कहा किसी से उससे कह गयी

जाने कब उसकी बातों में आ गयी 
बहकी ऐसी की जाने क्या पा गयी

चंद पलों में वो जिगर हो गया
इंतज़ार सुबह शाम दोपहर हो गया

अजनबी थी उस रूह से
अनजान उसकी खुश्बू से

जानती थी ख्वाब था
पर क्या करती लाजवाब था

मुझको मुझी से चुरा ले गया
अपने लिए जी यही सिखा गया

उसका झूठ भी सच लगता था
जब कभी वो मुझे "जान" कहता था

इक तड़प रहती थी उससे मिलने की
तिल तिल मरके उसके साथ जीने की

दिल बस भींच कर रखा था
एक सुरूर को सींच कर रखा था

बांवरी थी ,उसके कहे पर भटक जाती 
ज़िद्दी थी ,दुनिया को खटक जाती

उसका इश्क मुझे जायज़ लगता था
दुनिया को ये रिश्ता नाजायज़ लगता था

उसकी दीवानगी ...अब मेरी लत थी
लाख दुनिया कहे मेरी पसंद गलत थी

सच जानती थी
पर चुप्पी लगा बैठी थी
उसके हर झूठ को 
अपना हाथ थमा बैठी थी
उसके संग दूर निकल आयी थी
खुद जीती हुई 
अपनों को पीछे छोड़ आयी थी

आज मैं हूँ .... कल्पना
पर 
तनहा हूँ .....

जो संग उडा 
वो हवा का झोंका 
वो साथी 
वो दीवाना 
था कोई नहीं 
था मेरा वहम

आईने की धूल पर 
कोई लिख गया था.......
तुम्हारा 
सिर्फ तुम्हारा 
अहम्

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