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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

ज़िन्दगी.....

कभी सोचती हूँ .....
"ज़िन्दगी "......रुके समुंदर सी होती !
कितना अच्छा होता ....
 बिना लहरों वाला समुंदर 
इक सरीखा सा  ......
न उतार ......
न चढ़ाव ....
 बस ........जिये जाओ 
गिन गिन साँसे .....लिए जाओ

फिर सोचती हूँ तब .....
दो कदम .....आगे चलकर 
दो कदम पीछे गिरने का मज़ा कैसे लेती ?
 दो कदम .....पीछे से 
इक फर्लांग की कूद कैसे लगाती  ?
दो चार .....साँसे फ़ालतू कैसे लेती ?
ना .....ना.....
लहरों वाला समुंदर ही ठीक है 
ये लहरें .....
मुझे ज़िंदा रखे हुए हैं

रुका हुआ समुंदर ......
ज़िन्दगी के बाद देख लेंगे 
वो तो ....वही खड़ा रहेगा 
मेरे जीकर आने तक

कल्पना पाण्डेय

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