सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

प्रेम......

प्रेम का कोई रंग नहीं ......न ही कोई खनक 
फिर कैसे छोड़ आता है अपनी छाप 
बताओ न .....
कैसे सुना आता है अपनी चाप  

प्रेम का कोई आकार नहीं ....न ही कोई गंध फिर कहाँ रख पाता है इतने एहसास 
बताओ न .....
कैसे दे आता है सगरे आभास  

प्रेम का कोई पता नहीं .....न ही कोई प्रारूप  फिर कैसे सटीक दर पर है धरता अर्ज़ी
बताओ न 
कैसे है इतनी करता मनमर्जी

प्रेम का कोई आदि नहीं.... न ही कोई अंत  
फिर कैसे जो क़तरा है , समुंदर भी है
बताओ न 
जो सामने है , वो कैसे अंदर भी है



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