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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

श्वेत - श्याम .......


"श्वेत - श्याम" तो तुम हो ....देव 
मैं तो चटक रंगो का कैनवास भर हूँ  
खूबसूरती की वजह मैं नहीं 
"श्वेत - श्याम "वाली 
पहल है तुम्हारी

मेरे नेह को जब जब तुम 
अपने स्नेह के 
हलके रंग से उभारते हो 
तुम "श्वेत" हो....देव

मेरी त्रुटियों को ढांक देते हो 
हलके बिन्दुओं से 
तब भी तुम "श्वेत" हो ....देव   

मेरी ख्वाइश को छु छु कर 
आकार देते हो 
तब भी "श्वेत "रहते हो .....देव

और ....
"श्याम" तब तब ....जब 
मेरे चटख रंगो को , गीला बताते हो 
 मेरा आकाश व्यर्थ , अपना नीला बताते हो 
मेरे प्रयास बेसुरे , अपने को सुरीला बताते हो  
तब तुम बेहद "श्याम " हो जाते हो .....देव 
 कैसे कहूँ ?..."श्याम"नज़र भी आते हो ......देव
उस पल सन्नाटा 
महसूस करती हूँ अपने रंगों पर

 मुस्कुराते हुए .....
तुम फिर "श्वेत" हो जाते हो ....देव 
 मुझे मनाने लौट आते हो .....देव 
"श्वेत " वाली थाल 
मुझ पर उड़ेलने के लिए 
 मेरे रंगों से खेलने के लिए 
 संग रहने के लिए 
संग बहने के लिए  



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