रविवार, 14 फ़रवरी 2016

वो खत .....

खत तो ....
कब का पढ़के रख दिया है 
किताबों के बीच कहीं .....
बस ....
कुछ एहसास ....
कुछ लफ़्ज़ .....
भूले बिसरे 
चले आते है जहन तक 
रोज़ .....इक नयी सरसराहट लिए हुए 
हुबहु ......तेरी वाली आहट लिए हुए 

और ....
वो खत .....
किताब के महकते हर्फ़ से 
रोज़ ही लिपटता है
कहता जाता है......
अपनी रूह की  
अंतर्मन की

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