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रविवार, 14 फ़रवरी 2016

इज़हार......

चाँद तुम भी न ......
बिलकुल 
"जीरो बट्टा निल"  लगते हो 
इश्क के मामले में 
अलग अलग भेस धर के 
क्या सोचते हो 
मुझे ठग लोगे तुम ?
रात की काली चदरिया ओढ़ लो 
या तारों वाली अचकन पहन लो 
 अपना स्पर्श कैसे बदल लोगे तुम ?
जान छिड़कती है चांदनी मुझ पर
 राहों में उसकी कैसे दखल दोगे तुम ?

लाख छिपाना चाहो ये पैगाम 
जो तुम मेरे लिए दिन भर 
छिप छिप कर लिखते हो 
सूरज की नज़र से 
बचा बचा कर रखते हो 
 दे क्यों नहीं देते  ?
कह क्यों नहीं देते  ?
कब उस जीने से 
 उतर कर नीचे 
मेरे करीब आओगे तुम ?
तुम्हारा हूँ .....कहोगे तुम
तुम्हारे  लिये 
रात भर चला हूँ ......कहोगे तुम
कह दो न आज ......
आज तो .....बस कह ही दो
या 
उम्र भर मेरे लिए 
यूँ ही "जीरो बट्टा निल" ही रहोगे ?
बस गोल गोल ....चाँद जैसे  
मेरे लिए ...... चमकते शून्य जैसे



  

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