शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

तुम.....

रेत ही रेत हैं हम 
और तुम 
आकाश कहते हो  
छुआ भी नहीं 
और तुम 
आभास कहते हो  

ये रास्ते 
किधर भी नहीं जाते  
और तुम 
हो की इन्हे 
उजास कहते हो  

इक हंसी 
ओढ़े बैठे तो हैं लब पर 
 और तुम 
इसे ज़बरदस्त 
लिबास कहते हो    


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