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शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

पहाड़ी आसमान में उड़ते दो बादल


पहाड़ी आसमान में उड़ते दो बादलों में
एक पहाड़ी ,एक विदेशी सा लगता है
दोनो को जुड़ा हुआ देख ,
पुराना याराना सा लगता है
मुस्कुराता हुआ बादलों का जोड़ा ,
पहाड़ी सुन्दरता को निहारता सा लगता है
उनकी आँखों से ये नज़ारा,
कुछ इस तरह सा लगता है
पहाड़ की फिजा में पुराना कोई गीत गूंजता सा लगता है
सब कुछ यहाँ धुला धुला,स्वच्छ , उजला-उजला सा लगता है
शहर की उलझनों से दूर ,थमा सा ,सांस लेता हुआ सा लगता है
दो पल रुक ,दूसरों की नयी -ताज़ी सुनता सुनाता सा लगता है
बदलते वक़्त के साथ ,किसी भी दम पर खुद न बदलता हुआ सा लगता है
पहाड़ से जुड़ा पहाड़ी कहलाने का गौरव प्राप्त करता सा लगता है
खुद जियो ,दूसरों को जीने दो का अर्थ सार्थक करता सा लगता है
मौसम भी यहाँ पल-पल आँख मिचौली खेलता सा लगता है
हर खिलता फूल आने वाले का स्वागत करता सा लगता है
फलों से लदा पेड तेरे सम्मान में सर झुकाया सा लगता है
कहीं कोयल, कहीं कोई पंछी का स्वर, हमारा हाल पूछता सा लगता है
रात को चमकता जुगनू ,अँधेरे में राह दिखता सा लगता है
भोर होते ही सूरज, मेरे द्वार पर पहली दस्तक देता सा लगता है
मंद मंद बहता हवा का झोंका, मेरे लिए, सिर्फ मेरे लिए बहता सा लगता है
पहाड़ के उस ओर बना घर रंगीन माचिस की डिबिया सा लगता है
दूर पहाड़ पर खड़ा देवदार का वृक्ष अपना परचम लहराता सा लगता है
ऊंची नीची सड़कों में जन और जीवन बंधा सा लगता
ऊँचाइयों पर बसा मेरा घर और उन्नत होने का आशीर्वाद सा देता लगता है
ऊंचा नीचा रास्ता हर दिन स्थिरता का इम्तेहान लेता सा लगता है
बड़ी सी नथ ,पिछोड़ा ओढे युवती का रूप यहाँ की संस्कृति का प्रचार करता सा लगता है
माथे पर पिठिया ,सर पर टोपी ,दाज्यू कहता हुआ युवक ठेट पहाड़ी सा लगता है
पहाड़ी आसमान से ऐसा नज़ारा देख कर बादलों को वक़्त का पता सा नहीं लगता है
चाह कर भी वक़्त रुकता नहीं ,छुट्टियाँ ख़त्म होने में समय कहाँ लगता है?
अनमना सा विदेशी बादल चुपचाप सामान बाँधता सा लगता है
नौकरी और रोटी की उलझन में शहर की तरफ खिंचता सा लगता है
जाऊं, न जाऊं? सोचकर विचलित सा ,त्रिशंकु की तरह लटका सा लगता है
पहाड़ी बादल हाथ पकड़कर दाल रोटी खा यहीं रुकने की प्रार्थना सा करता लगता है
पर विदेशी बादल जरूरत से लम्बी अपनी जरूरतों की गिनती गिनाता सा लगता है
भारी मन से आंसुओं की सौगात के साथ विदा लेता सा लगता है
जल्द से जल्द पहाड़ लौट आने का वादा देता सा लगता है
हाय !बेचारा कर्मभूमि के लिए ,जन्मभूमि को छोडता सा लगता है
विदेशी बादल आज पहाड़ से मैदान में उतरता सा लगता है
पीछे मुड़ -मुड़ कर पहाड़ी हर चीज़ को आँखों में समेटता सा लगता है
हरा -भरा उन्नत होते हुए भी अपनी जड़ों से कटा-कटा सा व्यथित लगता है
जल्द ही यहीं लौट कर बसने का प्रण अपने आप से करता सा लगता है
नीचे आता विदेशी बादल अपने भाग्य का कोसता सा लगता है
पहाड़ी बादल को दूर तक हाथ उठा-उठा शत-शत नमन सा करता है
इतने सालों बाद ,
आज भी आसमान में लटका पहाड़ी बादल ,मिटटी से जुड़ा ,बेहद संतुष्ट सा लगता है
पहाड़ी आसमान में नहीं,पूरी कायनात में उसका वजूद कायम सा लगता है
नित नए विदेशी बादलों की सोच बदलने के लिए ,वह सदा ही प्रयत्न्मान सा लगता है
आज भी वह बूढ़ा पहाड़ी बादल ,
अपने पुराने यार का इंतज़ार करता सा लगता है
आँखें बिछाये सा खड़ा लगता है

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